प्रारंभिक नगरों की कहानी हड़प्पा सभ्यता का पुरातत्व

परिचय-परिचय-
आज से लगभग 5000 वर्ष पहले सिन्धु नदी के तट पर स्थित सिन्धु घाटी सभ्यता विश्व की आरम्भिक चार प्रमुख सभ्यताओं में से एक थी। यह एक नगरीय सभ्यता थी। चूँकि पुरातत्वविदों द्वारा सर्वप्रथम हड़प्पा नगर की खोज की गई थी, इसीलिये इसे हड़प्पा सभ्यता भी कहा जाता है। हड़प्पा पंजाब के मांटगोमिरी जिले में था। हड़प्पा के पश्चात पुरातत्वविदों ने इस सभ्यता के अन्य नगरों मोहनजोदड़ो, चन्हूदड़ो, लोथल, कालीबंगान, रंगपुर, रोपड़, आलमगीरपुर आदि अनेकानेक नगरों की खोज की। यह पूरी सभ्यता एक त्रिभुजाकार क्षेत्र में फैली हुई थी।
भारतीय सभ्यता के ये सभी प्रारम्भिक नगर थे। इन सभी नगरों का पुरातत्वविदों ने जो उत्खनन किया, उससे इनकी अपनी कहानी लिखी गई।
पुरातत्व क्या है?
(What is Archaeology?)
इससे पहले कि हम हड़प्पा सभ्यता के प्रारम्भिक नगरों की कहानी पर प्रकाश डालें, हमें यह जानना आवश्यक है कि पुरातत्व क्या है? पुरातत्व इतिहास की सर्वश्रेष्ठ कसौटी है। जिस ऐतिहासिक तथ्य को पुरातत्व का समर्थन प्राप्त नहीं है, उसकी नींव बालू पर टिकी होती है। समकालीन अर्थात् प्रत्यक्षदर्शी सामग्री ही पुरातात्विक सामग्री कहलाती है। हमारा वही इतिहास प्रमाणिक है जो ऐसी सामग्री को आधार बनाकर लिखा जाता है।’ विभिन्न स्थानों पर उत्खनन कर पुरातात्विक सामग्री की खोज करने वाले विद्वान पुरातत्ववेत्ता अथवा पुराविद् कहलाते हैं। पुरातत्वविद् धरती के भीतर छिपी हुई पुरातात्विक सामग्री द्वारा किसी भी देश के इतिहास की सीमा कोपीछे ढकेल सकते हैं।
पुरातत्व वह विज्ञान है जिसके माध्यम से पृथ्वी के गर्भ में छिपी हुई सामग्रियों की खुदाई कर अतीत के लोगों के भौतिक जीवन का ज्ञान प्राप्त किया जा सकता है। वैज्ञानिक तथ्यों पर आधारित होने के कारण पुरातत्व एक अंतिम तथा सर्वाधिक महत्वपूर्ण स्रोत है, इसके अन्तर्गत खुदाई में प्राप्त सिक्के, अभिलेख, खण्डहर व स्मारक आदि की गणना की जाती है। किसी भी जाति की सभ्यता का इतिहास प्राप्त करने का पुरातत्व एक प्रमुख साधन है। पुरातत्वविदों ने सिन्धु घाटी के समीपं उत्खनन कर जो पुरातात्विक सामग्री प्राप्त की, उसी सामग्री के आधार पर हड़प्पा सभ्यता के प्रारम्भिक नगरों की कहानी लिखी गई। इतिहास और पुरातत्व का घनिष्ठ सम्बन्ध है।
(प्रारंभिक नगरों की कहानी, हड़प्पा सभ्यता का पुरातत्व)
पुरातात्विक उत्खनन
(Archaeological Exploration)
किसी भी स्थल पर पुरातत्वविद् पहले लम्बवत् उत्खनन करते हैं। इससे विभिन्न सभ्यताओं की प्राचीनता का पता चलता है। पुरातात्विक वस्तुएँ जितनी गहराई पर प्राप्त होती हैं वे उतनी ही प्राचीन होती हैं। इसे काल निर्णय में स्तरीकरण का सिद्धान्त कहा जाता है। पिट रिबर्स महोदय (1835-1902 ई.) ने पुरातात्विक – स्तरीकरण के वैज्ञानिक अध्ययन की नींव मिस्र (Egypt) में डाली थी। जिस किसी भी स्तर के बारे में हमें विस्तृत जानकारी प्राप्त – करनी होती है, उस गहराई पर क्षैतिज उत्खनन कराया जाता है।
15 जनवरी, 1784 ई. को विलियम जोन्स ने कलकत्ता = में एसियाटिक सोसाइटी की स्थापना की। यहीं से भारत में भारत का इतिहास जानने हेतु पुरातात्विक अन्वेषण का आरम्भ हुआ। 1861 ई. में भारत में पुरातत्व विभाग की स्थापना हुई। कनिंघम महोदय को इसका डायरेक्टर नियुक्त किया गया। 1872.ई. में सारे भारत में पुरातत्व विषयक खोज कराने का निश्चय किया गया एवं कनिंघम महोदय को ही इस परियोजना का डायरेक्टर एस जनरल बनाया गया। 1902 ई. में सर जान मार्शल डायरेक्टर जनरल बने। इन्हीं के समय रायबहादुर दयाराम साहनी ने उत्खनन द्वारा हड़प्पा स्थल की खोज की। यहाँ प्राप्त मोहरों के आधार पर ही 1924 ई. में भारतीय पुरातत्व सर्वेक्षण के डायरेक्टर जनरल सर जान मार्शल ने समस्त विश्व के समक्ष एक नवीन सभ्यता (सिन्धु घाटी सभ्यता) की खोज की घोषणा कर दी।
हड़प्पा सभ्यता की खोज की कहानी
(Story of the Discovery of Harappan Civilization)
1826 ई. में सर्वप्रथम हड़प्पा टीले का उल्लेख चार्ल्स मैसन द्वारा किया गया। 1856 ई. में कराँची से लाहौर तक रेललाइन बिछाने के दौरान हुई खुदाई में जान ब्रेटन एवं विलियम बंटन नामक अंग्रेजों को कुछ पुरातात्विक अवशेष प्राप्त हुये। 1873 ई. में जनरल कनिंघम को भी कुछ हड़प्पाई पुरावस्तुएँ प्राप्त हुई। 1912 ई. में जे. एफ. फ्लीट महोदय ने यहाँ प्राप्त पुरावस्तुओं के आधार पर एक लेख लिखा।
कनिंघम एवं फ्लीट महोदय हड़प्पा सभ्यता के महत्व का मूल्यांकन करने में असमर्थ रहे। इस महत्वपूर्ण सभ्यता के महत्व का पता लगाने का श्रेय रायबहादुर दयाराम साहनी की जाता है। दयाराम साहनी ने 1921 ई. में पाकिस्तान के पंजाब प्रान्त में रावी नदी के तट पर स्थित हड़प्पा नामक स्थल पर पुरातात्विक उत्खनन कर कई हड़प्पाई
मोहरें प्राप्त कीं। दूसरे ही वर्ष 1922 ई. में राखलदास बनर्जी ने मोहनजोदड़ो की खोज की। यह स्थान पाकिस्तान के सिन्ध प्रान्त के लरकाना जिले में सिन्धु नदी के तट पर स्थित था। इस ‘प्रकार हड़प्पा सभ्यता का उद्भव हुआ और फिर यहाँ हुए पुरातात्विक उत्खननों में एक के बाद एक कई नगर प्राप्त हुये। पिगट महोदय ने हड़प्पा एवं मोहनजोदड़ो को एक विस्तृत साम्राज्य की जुड़वाँ राजधानियाँ बताया है। इनके बीच की दूरी 670 किमी. है।
हड़प्पा सभ्यता का विस्तार
(Extension of Harappan Civilization)
रंगनाथ राव महोदय के अनुसार हड़प्पा सभ्यता का विस्तार पूर्व से पश्चिम तक 1600 किमी. एवं उत्तर से दक्षिण तक 1100 किमी. है परन्तु उत्तर में सरायखेला आदि स्थलों की प्राप्ति से यह सीमा और बढ़ गई है। यह सभ्यता एक त्रिभुजाकार क्षेत्र में विस्तृत है, जिसका क्षेत्रफल कुछ समय पूर्व विद्वानों ने 12,99,600 वर्ग किमी. बताया था। यह सभ्यता उत्तर में जम्मू के अखनूर से लेकर दक्षिण में नर्मदा नदी के तट तक एवं पश्चिम में बलूचिस्तान के मकरान समुद्र तट से लेकर उत्तर पूर्व में मेरठ तक विस्तृत है। इस सभ्यता का क्षेत्रफल मिस्र से 20 गुना तथा मिस्र तथा मेसोपोटामिया दोनों के सम्मिलित क्षेत्र से 12 गुना अधिक है।
हड़प्पा सभ्यता का काल
(Period of Harappan Civilization)
हड़प्पा सभ्यता के काल को लेकर विभिन्न विद्वानों में मतभेद हैं। विभिन्न विद्वानों ने इस सभ्यता का काल निम्नानुसार निर्धारित किया है-
1. सर जान मार्शल (3250-2750 ई. पू. 2800-2500 ई. पू.)
2. अर्नेस्ट पैके (2700-2500 ई.पू.)
3. माधव स्वरूप वत्स (3200-2750 ई. पू.)
4. राधाकुमुद मुखर्जी (2500-1750 ई.पू)
5. आर. ई. एम. व्होलर (2500-1500 ई.पू.
6. डॉ. वी. ए. स्मिथ (2500-1750 ई. पू.)
7. रेडियोकार्बन विधि (C-14) काल
इसमें से कार्बन-14 विधि एवं डॉ. व्हीलर द्वारा निर्धारित हड़प्पा सभ्यता की तिथि 2500-1750 ई. पू. अधिकांश लोगों द्वारा मान्य की गई है। कार्बन-14 विधि (Carbon-14 Method)- तिथि निर्धारण की वैज्ञानिक विधि को कार्बन-14 विधि कहा जाता है। इस विधि की खोज अमेरिका के प्रख्यात रसायनशास्त्री बी. एफ. लिवी द्वारा सन् 1946 ई. में की गई थी। इस विधि के अनुसार किसी भी जीवित वस्तु में कार्बन-12 एवं कार्बन-14 समान मात्रा में पाया जाता है। मृत्यु अथवा विनाश की अवस्था में C-12 तो स्थिर रहता है, मगर C-14 का निरन्तर क्षय होने लगता है। कार्बन का अर्थ-आयु काल 5568 ± 30 वर्ष होता है, अर्थात् इतने वर्षों में उस पदार्थ में C-14 की मात्रा आधी रह जाती है। इस प्रकार वस्तु के काल की गणना की जाती है। जिस पदार्थ में कार्बन-14 की मात्रा जितनी कम होती है, वह उतना ही प्राचीनतम माना जाता है। पदार्थों में C-14 के क्षय की प्रक्रिया को रेडियोधर्मिता (Radio Activity) कहा जाता है।
हड़प्पा नगरों से प्राप्त वस्तुएँ
(Things Found from Harrapan Cities)
पुरातत्वविदों ने हड़य्या सभ्यता के विभिन्न स्थलों से पुरातात्विक उत्खनन द्वारा विभिन्न पुरातात्विक सामग्री प्राप्त की। इनके द्वारा प्रस्तुत की गई पुरातात्विक रिपोर्टों में इन वस्तुओं का उल्लेख मिलता है। हड़प्पा सभ्यता के कुछ प्रमुख शहरों से निम्नानुसार सामग्री प्राप्त हुई-192
(1) मोहनजोदड़ो मोहनजोदड़ो सिन्धी भाषा का शब्द है, जिसका अर्थ होता है- मृतकों का टीला। मोहनजोदड़ो के आस-पास की भूमि बड़ी उपजाऊ थी। इसे सिन्ध का बाग कहा जाता था। यहाँ से 1398 मुहरें, पुजारी का सिर, मोम के साँचे, कांस्य की नर्तकी, सभागार, रोष का पैमाना, सूती कपड़े के अवशेष, पानी का जहाज, हाथी का कपाल, शिलाजीत, गाड़ी के पहिये, मेसोपोटामिया की मोहरें, दाल्हो बाले मनुष्य की प्रतिमा, हाथी दाँत की तराजू, पशुपति की मुद्रा आदि वस्तुएँ प्राप्त हुई।
(2) हड़प्पा यहाँ से स्त्रियों की लघु मृण्मूर्तियाँ, स्त्री की मूर्ति जिसके गर्भ से पौधा निकलता हुआ दिखता है, पत्थर के शिश्न व योनि, ठोस पहिये वाली गाड़ी, प्रसाधन मंत्रया, RH-37 कब्रिस्तान, लकड़ी का हल, लेख युक्त बर्तन, मुखौटे, शंख का बैल, ताँबे की मुहरें, जौ, गेहूँ की भूसी, मटर व तिल की खेती के प्रमाण एवं खरगोश के चित्र वाली मुद्रा मिली है।
(3) चन्हूदड़ो यहाँ से मनके बनाने का कारखाना, अलंकृत हाथी, श्वान, पीतल को बत्तख, लिपिस्टिक तराजू एवं बैलगाड़ी आदि मिले हैं। यह मोहनजोदड़ों में 128 कि पी. दूर स्थित है।
(4) लौथल यहाँ से फारस की मोहर, धान व बाजरे की खेती के प्रमाण, आटा पीसने वाली चक्की, हाथी दाँत का पैमाना, मनकों का कारखाना, कुत्ते की मूर्ति, बकरी की हड्डियाँ, तीन युगल शवाधान एवं गोदी (बन्दरगाह) के प्रमाण मिले हैं।
(5) कालीबंगान यहाँ से अग्निकुंड, बेलनाकार मोहरें, अलंकृत फर्श, ताँबे के बैल की मूर्ति, लकड़ी की नाली, नक्काशीदार ईंटें, मस्तिष्क शोथ की बीमारी वाला कपाल, हल से जुते खेत के साक्ष्य एवं भूकम्प के प्राचीनतम प्रमाण मिले हैं।
(6) बनावली- यहाँ से चक्राकार अंगूठियाँ, नाक व कान की बालियाँ, मछली पकड़ने का काँटा एवं मिट्टी के बने खिलौने आदि मिले हैं।
उद्धरण किसी बड़े स्थल की पुरातात्विक रिपोर्ट
(Excerpt: Archaeological Report on a Major Site)
रायबहादुर दयाराम साहनी, राखलदास बनर्जी, एन. जी. मजूमदार, अर्नेस्ट मैके, रवीन्द्र सिंह विष्ट, सूरजभान, यज्ञदत्त शर्मा, बी. बी. लाल, जगपति जोशी एवं रंगनाथ राव आदि ने हड़प्पा सभ्यता के विभिन्न स्थलों के उत्खनन के उपरान्त पुरातात्विक रिपोर्ट प्रस्तुत की थी। इन पुरातात्विक रिपोर्टों में विभिन्न स्थलों पर प्राप्त पुरातात्विक सामग्री का विस्तृत विवरण प्रस्तुत किया है।
इन पुरातत्वविदों ने स्वयं भी अपनी रिपोटों में कुछ प्राप्त वस्तुओं का वैज्ञानिक विश्लेषण प्रस्तुत किया है। इन्होंने वर्तमान में प्रचलित सामग्री से यहाँ प्राप्त सामग्री को तुलना कर अपने निष्कर्ष प्रस्तुत किये हैं। इनके द्वारा प्रस्तुत निष्कर्षों के आधार पर वर्तमान के अन्य विद्वानों ने भी अपना पृथक् विश्लेषण प्रस्तुत किया है। चूंकि अभी तक हड़ाया सभ्यता की लिपि पढ़ी नहीं जा सकी है, अतः सभी निष्कर्ष अनुमानों पर ही आधारित हैं।
इसी कारण यहाँ प्राप्त पुरातात्विक सामग्री के बारे में कुछ मतभेद भी हैं। मगर अधिकांशतः विद्वानों की राय प्रायः एक सी रही है।
प्रख्यात पुरातत्वविद् अर्नेस्ट मैके महोदय ने मोहनजोदड़ो में हुए उत्खनन पर 1937 ई. में अपनी रिपोर्ट Further Excavation at Mohanzodaro) प्रस्तुत की। मैके को यहाँ एक वर्तमान की पत्थर की चक्कों की तरह का एक अवतल पत्थर मिला, साथ ही सिल पर बट्टे की तरह का एक पत्थर भी मिला। उन्होंने इसे अवतल चक्की की संज्ञा देते हुये लिखा है कि, “अवतल चक्की. यहाँ अधिक संख्या में प्राप्त हुई
ऐसा लगता है कि अन्न पीसने का ये एक मात्र साधन थीं। ये चक्कियाँ साधारण रूप से कोर, पथरीले, आग्नेय अथवा बलुआ पत्थर द्वारा बनी माँ एवं इनके अत्यधिक प्रयोग के संकेत मिलते हैं। चूँकि इन पत्थर की चक्कियों के तल सामान्यतः उत्तल है, अतः निश्चित तौर पर इन्हें भूमि में अथवा मिट्टी में जमाकर रखा जाता होगा ताकि ये हिल न सकें। यहाँ प्रमुखतः दो प्रकार की चक्कियाँ मिली है। एक में ऊपर वाला छोटा पत्थर नीचे वाले पत्या पर आगे-पीछे चलाया जाता था, इससे नीचे वाला पत्यर खोखला हो गया था। दूसरी वे जिनमें ऊपर वाले पत्थर द्वारा जड़ी-बूटियों तया मसालों को कूटा जाता था।”
अर्नेस्ट मैके द्वारा मोहनजोदड़ो की खुदाई पर प्रस्तुत इस रिपोर्ट में वर्तमान की चक्कियों को ध्यान में रखते हुये यहाँ के उत्खनन में प्राप्त इसी के अनुरूप पत्थर की आकृति को चक्की की मांज्ञा देते हुये उसका विस्तृत विवरण प्रस्तुत किया है।
पुरातात्विक रिपोर्ट का इतिहास लेखन में इतिहासकारों द्वारा उपयोग
(Utilization of Archaeological Report by Historians in History Writing)
विभिन्न पुरातत्वविदों द्वारा उत्खनन के पश्चात् पुरातात्विक रिपोर्ट प्रकाशित की जाती हैं। इन्हीं रिपोटों से पता चलता है कि इन्हें स्थल विशेष के उत्खनन से क्या-क्या पुरातात्विक सामग्री प्राप्त हुई है? कुछ सामग्री का विश्लेषण तो अर्नेस्ट मैके महोदय की भाँति पुरातत्वविद् स्वयं कर देते हैं एवं कुछ सामग्री का मात्र उल्लेख ही रहता है। इनकी रिपोर्टों का अध्ययन कर इतिहासकार उस स्थान का इतिहास लिखने का प्रयास करता है।
पुरातत्वविद् एवं इतिहासकार उत्खनन में प्राप्त सामग्री की उपयोगिता का अनुमान वर्तमान में प्रयुक्त वस्तुओं से उनकी तुलना कर लगाते हैं। पुरातात्विक सामग्री का समग्रता में अध्ययन कर किसी भी सभ्यता की सामाजिक, आर्थिक, धार्मिक एवं राजनीतिक स्थिति का प्रस्तुतीकरण किया जा सकता है। हड़प्पा सभ्यता का सम्पूर्ण इतिहास इसी प्रकार इतिहासकारों द्वारा लिखा गया है। इसके लिये इतिहासकार एवं पुरातत्वविदों को ज्ञात से अज्ञात की ओर बढ़ना पड़ता है। अर्थात् वे वर्तमान के सन्दर्भ में अतीत का अध्ययन करते हैं।
मोहनजोदड़ो में 39 फीट लम्बा, 25 फीट चौड़ा तथा 8 फीट गहरा एक विशाल स्नानागार मिला एवं अनुमान लगाया गया कि यह सम्भवतः धार्मिक अनुष्ठान के समय उपयोग में लाया जाता होगा। कालीबंगान से अग्निमुण्ड एवं सोच से वेदियों मिलों, वे भी यहाँ होने वाले धार्मिक अनुष्खों की ओर हांकेत करती हैं। कुछ मुहरों पर भी धार्मिक अनुष्वन सम्बन्धी चित्र मिलते हैं। मोहनजोदड़ों में एक आडमी की पाषाण मूर्ति मिली। धार्मिक अनुष्ठानों से सम्बन्धित पुरातात्विक सामग्री की बहुलता को देखते हुये इसे ‘पुरोहित राजा’ की संज्ञा दी गई।
चूंकि इसके समकालीन मेसापोटामिया की सभ्यता में भी पुरोहित राजा होते थे, अतः हड़प्पा सभ्यता में भी इसे पुरोहित राजा मानते हुए एक यह अनुमान प्रतिपादित किया गया कि सम्भवतः इस सभ्यता में पुरोहित राजा रहे होंगे। इसी आधार पर मोहनजोदड़ी में मिले एक विशाल भवन को एक राजाशसाद की संज्ञा दी गई।
हड़प्पा सभ्यता एवं भारतीय पुरातत्व सर्वेक्षण के डायरेक्टर जनरल
(Harappan Civilization and the Director Generals of Archaeological Survey)
भारतीय पुरातत्व सर्वेक्षण के डायरेक्टर जनरलों में कनिंघम मार्शल एवं व्हीलर का नाम प्रमुखता से लिया जा सकता है। इनके योगदान का उल्लेख इस प्रकार है-
(1) ए, कनिंघम भारतीय पुरातत्व सर्वेक्षण विभाग के प्रथम डायरेक्टर जनरल ए. कनियम थे। आरम्भिक बस्तियों की जानकारी के लिए उन्होंने चीनी बौद्ध यात्रियों के वृत्तान्तों का अध्ययन किया। कनिंघम की रुचि सांस्कृतिक महत्व के पुरावशेष खोजने में अधिक थी। उनकी रुचि छठवीं शताब्दी ई. पू. से चौथी शताब्दी ई. के एवं उसके बाद के पुरातात्विक अन्वेषणों में भी थी। हड़प्पा के अवशेषों का विवरण न तो चीनी यात्रियों ने किया और न ही वे छठवीं शताब्दी ई. पू. के बाद के थे। इसलिए कनिघम के रुचि के ढाँचे में यह शामिल नहीं था।
एक बार एक अंग्रेज ने कनिगम को एक मुहर दो जो हड़प्पा सभ्यता की थी। उन्होंने अपनी रुचि के कालखण्ड में इसे रखने की कोशिश की मगर असफल रहे। सफल होते भी कैसे यह हड़प्पा काल की जी थी।
(2) जॉन मार्शल जॉन मार्शल 1924 में भारतीय पुरातत्व सर्वेक्षण विभाग के डायरेक्टर जनरल जॉन मार्शल ने समस्त विश्व के समक्ष सिधुघाटी के एक नवीन सभ्यता की खोज को घोषणा की। इस तारतम्य में एस. एन. राय ने लिखा है- “मार्शल ने भारत को जहाँ पाया था. उसने तीन हजार वर्ष पीछे छोड़ा। इस प्रकार विश्व को मेसोपोटामिया के समकालीन एक नवीन सभ्यता की जानकारी मिली। उनके कार्यों का मूल्यांकन इस प्रकार किया जा सकता है।
(1) भारत में कार्य करने वाले वे पहले पेशेवर पुरातत्वविद् थे। उन्होंने इससे पूर्व यूनान एवं कीट में काम किया था। वहाँ का अनुभव यहाँ काम आया। कनियम को भाँति उनहें भी आकर्षक खोजों में दिलचस्पी थी। मार्शल की उत्सुकता दैनिक जीवन की पद्धतियाँ जानने में भी थी।
(11) उत्खनन में स्तर विन्यास का ध्यान रखना होता है। मार्शल ने स्तर विन्यास को अनदेखा करते हुए पूरे टीले में समान परिमाण वालो क्षैतिज इकाइयों का एकमुश्त उत्खनन कराया। इससे पृथक् पृथक् स्तरों से सम्बन्ध होने पर भी एक इकाई विशेष से प्राप्त सभी पुरावस्तुओं को सामूहिक रूप से वर्गीकृत किया जाता था। इससे बहुमूल्य जानकारी नहीं मिल पाती थी।
(3) आर. ई. एम. व्हीलर-व्हीलर 1944 में भारतीय पुरातात्विक सर्वेक्षण के डायरेक्टर जनरल बने। उन्होंने मार्शल के विपरीत यह माना कि एक समान क्षेतिज इकाइयों के आधार पर खुदाई के स्थान पर टोले के स्तर विन्यास का अनुसरण करना अधिक आवश्यक था। ये सेना में ब्रिगेडियर रह चुके थे। आत: उन्होंने खुदाई में भी अनुशासन एवं परिशुद्धता पर जोर दिया।
हड़प्पा सभ्यता के अधिकांश स्थल विभाजन के पश्चात् पाकिस्तान में चले गए। अतः स्वतन्त्रता पश्चात् भारतीय पुराविर्दो ने भारतीय पुरास्थलों को चिह्नित करने पर जोर दिया। कच्छ में सम्पन्न व्यापक सर्वेक्षणों से कई बस्तियाँ प्रकाश में आर्यों। कालीबंगान, लोथल, राखीगढ़ी एवं हाल में ही हुई धौलावीरा की खोज इन्हीं प्रयासों का परिणाम है।
हड़प्पा एवं मोहनजोदड़ों में और अधिक जानकारी बाबत भारतीय तथा विदेशी विद्वानों ने रुचि ली। आधुनिक वैज्ञानिक तकनीकों का प्रयोग किया गया। प्राप्त पुरावशेषों का वैज्ञानिक दृष्टि से सूक्ष्म अध्ययन कर नवीन तथ्यौ को प्रकाश में लाया गया।
लोथल में एक गोदी (डाकयार्ड) मिली, साथ ही काप्स की कुछ मोहरें मिलों। मोहनजोदड़ो से एक बर्तन पर नाव का चित्र बना हुआ मिला। कालोवंगान में बेलनाकार मुहरें मिलों। बेलनाकार मुहों मेसोपोटामिया की विशेषता थीं। मेसोपोटामिया में हड़प्पा की शीले मिलीं। इन सत्र पुरातात्विक साक्ष्यों से एक कहानों का निर्माण हुआ कि हड़प्पा सभ्यता का मेसोपोटामिया एवं फारस के साथ व्यापारिक सम्बन्ध था। यह व्यापार नात्रों द्वारा समुद्र के रास्ते में होता था। यह कहानी तब और प्रमाणिक वाहाँ साबित हुई जबकि मेसोपोटामिया के एक अभिलेख में मेलुहा (सिन्धु क्षेत्र) के साथ व्यापार सम्बन्धों की चर्चा मिली।
वर्तमान के शिवलिंगों को भाँति कुछ पत्थर भी विभिन्न स्थलों को खुदाई से मिले हैं। अब बैंक वहाँ धर्म का विशेष महत्व था अतः यह लिग भी हो सकते हैं और खेल की गोटिया
,बनवाली से कुछ खिलीने भी मिले हैं। एक पकी मिट्टी की खिलौना गाड़ी भी मिली है। अतः इनका विश्लेषण पुरातत्वविद् अर्नेस्ट मैके ने 1948 ई. में ‘अर्ली इण्डस सिविलाइजेशन’ में इस प्रकार किया है| हड़प्पा सभ्यता के उत्खनन में अत्यधिक संख्या में नारी मूर्तियाँ मिली है। मोहनजोदड़ों से धातु की बनी एक मूर्ति मिली है। यह आभूषणों से अलंकृत है। इसे कुछ विद्वानों ने मातृदेवों की मूर्ति कहा है। मोहनजोदड़ों से ही एक अन्य नृत्य करती मिट्टी की मूर्ति प्राप्त हुई है। इससे विद्वानों ने यह अनुमान प्रस्तुत किया है कि हड़प्पा सभ्यता के परिवार मातृसत्तात्मक होते थे।
“लाजवर्द मणि, जैस्पर, चाल्सेडनी तथा अन्य पत्थरों से बने छोटे आकार के शंकुओं जो सुन्दरता से तराशे और तैयार किये गये थे तथा जो दो इंच से भी कम ऊँचाई के थे, को लिंग भी माना गया है….. दूसरी तरफ यह भी सम्भव है कि इनका प्रयोग पट्टों पर खेले जाने वाले खेलों में होता रहा होगा…..।”
अर्थात् ये पत्थर की मुहरें भी हो सकती हैं, खेल की गोटी भी हो सकती है और लिंग भी।
चन्हुदड़ो से एक बैलगाड़ी के साक्ष्य मिले हैं। कालीबंगान से हल से जूते खेत के साक्ष्य मिले हैं। बनावली से मिट्टी से बने हल के प्रतिरूप मिले हैं। कुछ स्थानों से पकी मिट्टी से बनी वृषभ की मूर्ति मिली है। एक स्थान से चित्र में दिखाई गई पकी मिट्टी की खिलौना गाड़ी मिली है। इनसे अनुमान लगाया जा सकता है कि हड़प्पा सभ्यता में भी बैलगाड़ी चलती होंगी जो सामान ढोने का कार्य करती होंगी। इससे आन्तरिक व्यापार का संकेत मिलता है। साथ ही यह भी कि हड़प्पा सभ्यता में हल द्वारा खेती भी की जाती रही होगी।
हड़प्पा सभ्यता के उत्खनन में अत्यधिक संख्या में नारी मूर्तियाँ मिली है। मोहनजोदड़ों से धातु की बनी एक मूर्ति मिली है। यह आभूषणों से अलंकृत है। इसे कुछ विद्वानों ने मातृदेवों की मूर्ति कहा है। मोहनजोदड़ों से ही एक अन्य नृत्य करती मिट्टी की मूर्ति प्राप्त हुई है। इससे विद्वानों ने यह अनुमान प्रस्तुत किया है कि हड़प्पा सभ्यता के परिवार मातृसत्तात्मक होते थे।
इस प्रकार पुरातात्विक रिपोर्ट का सांगोपांग अध्ययन कर, विदेशी सभ्यताओं से तुलना कर एवं वर्तमान के सन्दर्भ में इनका अध्ययन कर इतिहासकार किसी भी उत्खनित स्थल का सामाजिक, धार्मिक, राजनीतिक एवं आर्थिक इतिहास लिखने का प्रयास करते हैं।
हड़प्पा सभ्यता की सीमा
उत्तरी सीमा सरायखोला, गुमला घाटी, डाबर कोट
दक्षिणी सीमा-मालवण (ताप्ती नदी घाटी), भगवत
राब (नर्मदा घाटी)।
पूर्वी सीमा-आलमगीरपुर (हिण्डन नदी के किनारे)।
पश्चिमी सीमा सुत्कगेन डोर (मकरान का समुद्री तट)।
हड़प्पा सभ्यता के प्रमुख केन्द्र निम्नवत् हैं-
1. जम्मू में अखनूर एवं मांडा, 2. पंजाब (भारत) में रोपड़, संधोल, 3. पंजाब (पाकिस्तान) में हड़प्पा, 4. गुजरात में रंगपुर, लोथल, सुरकोतड़ा, मालवड़ रोवड़ी, 5. राजस्थान में कालीबंगान, 6. उत्तर प्रदेश में आलमगीरपुर, 7. हरियाणा में मीतांथल, वनबाली, राखीगढ़ी, 8. बलूचिस्तान (पाकिस्तान) में डाबरकोट, सोत्काकोह, सुत्कगेण्डोर, 9. सिन्ध (पाकिस्तान) में मोहनजोदड़ो, कोटदीजी, अलीमुराद, चन्हुदड़ो आदि।
नगर योजना
(Town Planning)
हड़प्पा संस्कृति की सर्वप्रमुख विशेषता इसका नगर नियोजन है। हड़प्पा एवं मौहनजोदड़ो की खुदाई में पूर्व तथा पश्चिम में दो टीले मिलते हैं। पूर्वी टीले पर नगर तथा पश्चिमी टीले पर दुर्ग स्थित था। दुर्ग में सम्भवतः शासक वर्ग के लोग रहते थे। दुर्ग में परिखा, प्राकार, द्वार, अट्टालक (बुर्ज = Tower), राजमार्ग, प्रासाद, कोष्ठागार, सभा एवं जलाशय आदि वास्तु के सभी तत्व मिलते हैं। प्रत्येक नगर में दुर्ग के बाहर निचले स्तर पर ईंटों के मकानों बाला नगर बसा था जहाँ सामान्य लोग रहते थे। नगरों के दुर्ग ऊँची और चौड़ी प्राचीरों (सुरक्षा दीवार) से घिरे थे। प्राचीरों में बुर्ज तथा मुख्य दिशाओं में द्वार (गोपुरम) बनाये गये थे। इनका निर्माण एक सुनिश्चित योजना के आधार पर किया गया था।
1. सड़क व्यवस्था-मोहनजोदड़ो की एक प्रमुख
विशेषता उसकी समतल एवं चौड़ी सड़कें थीं। यहाँ की मुख्य सड़क 9.15 मीटर चौड़ी थी जिसे पुराविदों ने राजपथ कहा है। अन्य सड़कों की चौड़ाई 2.75 से 3.66 मीटर तक थी। जाल पद्धति के आधार पर नगर नियोजन होने के कारण सड़कें एक-दूसरे को समकोण पर काटती थीं जिनसे नगर कई खण्डों में विभक्त हो गया था। इस पद्धति को ऑक्सफोर्ड सर्कस’ का नाम दिया गया है। सड़कें मिट्टी की बनी थीं एवं इनकी सफाई
की समुचित व्यवस्था थी। गलियों भी खुली तया चौड़ी थीं। कूड़ा इकट्ठा करने हेतु एक अन्तराल पर गड्ढे खोदे जाते थे अथवा कड़ेदान रखे जाते थे मोहनजोदड़ो की एक सड़क के दोनों किनारों पर चबूतरों के बने होने के साक्ष्य मिले हैं। सम्भवतः इन चबूतरों पर बैठकर दुकानदार वस्तुओं की विक्री करते होंगे। हमलावरों से सुरक्षा के लिए नगर के चारों और खाइयाँ थीं।
2. जल निकास प्रणाली-
मोहनजोदड़ो के नगर नियोजन की एक और प्रमुख विशेषता यहाँ को प्रभावशाली जल निकास प्रणाली थी। यहाँ के अधिकांश भवनों में निजी कुएँ व स्नानागार होते थे। भवन के कमरों, रसोई, स्नानागार, शौचालय आदि सभी का पानी भवन को छोटी-छोटी नालियों से निकल कर गली की नाली में आता था। गलो की नालो को मुख्य सड़क के दोनों ओर बनी पक्की नालियों से जोड़ा गया था। मुख्य सड़क के दोनों ओर बनी नालियों को पत्थरों अथवा शिलाओं द्वारा बैंक दिया जाता था। नालियों की सफाई एवं कूड़ा-करकट को निकालने के लिए बोच-बीच में नर मोखे (मेन होल) भी बनाये गये थे। नालियों की इस प्रकार को अद्भुत विशेषता किसी अन्य समकालीन नगर में देखने को नहीं मिलती।
3. स्नानागार-
मोहनजोदड़ो का एक प्रमुख सार्वजनिक स्थल है यहाँ के विशाल दुर्ग (54.86 × 33 मीटर) में स्थित विशाल स्नानागार। यह 39 फुट (11.88 मीटर) लम्बा, 23 फुट (7.01 मीटर) चौड़ा एवं 8 फुट (2.44 मीटर) गहरा है। इसमें उतरने के लिए उत्तर एवं दक्षिण की ओर सीढ़ियाँ बनी है। स्नानागार का फर्श पक्की ईंटों से बना है। सम्भवतः इस विशाल स्नानागार की उपयोग ‘आनुष्ठानिक स्नान’ हेतु होता होगा। स्नानागार के चारों ओर कमरे तथा बरामदे थे। स्नानागार से जल के निकास की भी व्यवस्था थी एवं स्वच्छ पानी को एक कुएँ द्वारा स्नानागार में लाया जाता था। वस्तुतः यह स्नानागार तत्कालीन उन्नत तकनीक का परिचायक है। मार्शल महोदय ने इसी कारण इसे तत्कालीन विश्व का ‘आश्चर्यजनक निर्माण’ बताया है।
4. अन्नागार-
मोहनजोदड़ो में ही 45.72 मीटर लम्बा एवं 22.86 मीटर चौड़ा एक अन्नागार मिला है। हड़प्पा के दुर्ग में भी 12 धान्य कोठार खोजे गये हैं। ये दो कतारों में छः-छः की संख्या में हैं। ये धान्य कोठार ईंटों के चबूतरों पर हैं एवं प्रत्येक का आकार 15.23 मी. x 6.09 मी. है। अन्नागार में हवा जाने की व्यवस्था थी। अन्नागार का सुदृढ़ आकार-प्रकार हवा आने-जाने की व्यवस्था तथा इनमें अन्न भरने की व्यवस्य निःसन्देह उच्चकोटि की थी।
5. ईंटें –
हड़प्पा संस्कृति के नगरों में पकाई हुई ईटों का प्रयोग भी यहाँ के नगर नियोजन की एक अद्भुत विशेषता है। ईर्ट चतुर्भुजाकार होती थीं। मोहनजोदड़ों से प्राप्त सबसे बड़ी ईर का आकार 51.43 × 26.27 × 6.35 सेमी. है। सामान्यतः 27.94 x 13.97 x 6.35 सेमी. की ईंटें प्रयुक्त हुई है। उल्लेखनीय बात यह है कि समकालीन मिस्र की सभ्यता में भी पकी ईंटों के स्थान पर धूप में सुखायी गई ईंटों का प्रयोग होता था। मेसोपोटामिया में यद्यपि पकी ईंटों का प्रयोग होता था किन्न काफी सीमित मात्रा में। इस प्रकार हम देखते हैं कि हड़प्पा सभ्यता की सर्वप्रमुख विशेषता यहाँ की नगर नियोजन प्रणाली ही थी।
नगर योजना की वर्तमान सन्दर्भ में उपादेयता
मोहनजोदड़ो एवं हड़प्पा को नगर योजना आज हमारे लिए आश्चर्य का विषय है। आज से साढ़े चार हजार वर्ष पहले के लोग नगर नियोजन के प्रति कितने जागरुक एवं निपुण थे? आज हम कितने भी प्रगतिशील एवं विकसित हों मगर नगर योजना के अभाव में हमें प्रत्येक बारिश में मुश्किलों का सामना करना पड़ता है। मुम्बई जैसा महानगर नगर योजना के अभाव में बाढ़ की स्थिति का सामना करता रहता है। यही हालत भारत के लगभग सत्तर फीसदी नगरों की है। ऐसे में मोहनजोदड़ो एवं हड़प्पा की नगर योजना की ओर हमारा ध्यान आकर्षित होता है। हमें चाहिए कि इससे प्रेरणा लेकर नगरों का विकास इसी भाँति किया जाये। नालियों की व्यवस्था मेनहोल के साथ इसी के अनुरूप होना चाहिए। सड़क व्यवस्था भी इसी अनुरूप की जानी चाहिए। यद्यपि हमने हमने चण्डीगढ़ एवं गाँधीनगर में नगर नियोजन नीति अपनाई है, मगर आवश्यक है कि हम हड़प्पा मोहनजोदड़ो से प्रेरणा लेकर भारत के प्रत्येक शहर में उसी अनुरूप नगर नियोजित करें।
हड़प्पा सभ्यता के राजनीतिक संगठन का स्वरूप
(Nature of Political Organisation of Harappan Civilization)
हड़प्पा सभ्यता की शासन व्यवस्था के बारे में साक्ष्यों के अभाव में कोई विशेष जानकारी नहीं मिलती। उत्खनन के परिणाम-स्वरूप जो भी साक्ष्य हमें उपलब्ध हैं, उनसे इस सभ्यता के राजनीतिक स्वरूप का अनुमान भर लगाया जा सकता है। उत्खनन से अभी तक न तो ऐसी कोई इमारत मिली है जिसको कि राजप्रसाद कहा जा सके, न ही कोई भव्य मन्दिर के अवशेष इस सभ्यता में शासन था। प्राप्त हुए ताकि अनुमान लगाया जा सके कि पुरोहित वर्ग का
है कि यहाँ का शासन सुदृढ़ दुर्गों द्वारा होता था। इन दुर्गों में मोहनजोदड़ो एवं हड़प्पा में प्राप्त दुर्गों से ऐसा प्रतीत होता बहुसंख्यक केन्द्रीय अधिकारी निवास करते थे।
वे श्रम, मूल्य
प्रारम्भिक नगरों की कहानी : हड़प्पा सभ्यता का पुरातत्व
भार आदि में एकरूपता स्थापित करने का प्रयास करते थे, साथ है में ही साथ सार्वजनिक भवनों का निर्माण तथा जीर्णोद्धार कराते थे। यात्रियों को ठहराने के लिए सरायें थीं। ऐसा भी अनुमान कि उनका एक राजा होता था जो सम्भवतः पुरोहित होता था। शासन में धर्म तत्व की प्रधानता थी। जनता से कर के रूप अनाज लिया जाता था। सैंधव सभ्यता के विस्तार के बावजूद इसमें जो एकरूपता दिखाई देती है, उससे ऐसा प्रतीत होता है कि हड़प्पा और मोहनजोदड़ो क्रमशः उत्तरी तथा दक्षिणी भारत के शासन केन्द्र थे। शायद इसीलिए स्टुअर्ट पिगट महोदय ने हड़प्पा और मोहनजोदड़ो को विशाल साम्राज्य की जुड़वाँ राजधानियाँ बतलाया है।
कुछ विद्वानों के अनुसार हड़प्पा सभ्यता का शासन व्यापारी वर्ग के हाथ में था। इस तर्क का प्रमुख आधार यह है कि हड़प्पावासी युद्ध प्रिय नहीं थे। विजय एवं साम्राज्य विस्तार उनकी कोई रुचि नहीं थी। इसकी अपेक्षा व्यापार-वाणिज्य में उनकी रुचि दृष्टिगोचर होती थी। में
सिन्धु घाटी के शान्तिपूर्ण जीवन के प्रमाणों को देखते हुए हम कह सकते हैं कि शासन-प्रणाली कोई भी हो परन्तु यह तो निश्चित है कि सिन्धु सभ्यता में शासन व्यवस्था निश्चित रूप से उच्च कोटि की थी।
सामाजिक जीवन (Social Life)- हड़प्पा सभ्यता में परम्परागत परिवार ही सामाजिक इकाई थी। उनका सामाजिक जीवन सुखी एवं सुविधापूर्ण था। उत्खनन में प्राप्त बहुसंख्यक नारी मूर्तियों की प्राप्ति से संकेत मिलता है कि उनका परिवार मातृ सत्तात्मक था। मातृ सत्तात्मक समाज द्रविड़ और प्राक्-आर्य सभ्यता की विशेषता थी।
हड़प्पाकालीन समाज की प्रमुख विशेषताएँ निम्नवत् हैं 1. हड़प्पा सभ्यता के लोग शाकाहारी तथा माँसाहारी दोनों प्रकार का भोजन करते थे।
2. खुदाई से प्राप्त सुइयों के अवशेष संकेत देते हैं कि ये लोग सिले वस्त्र पहनते थे।
3. केश विन्यास प्रचलित था। स्त्रियाँ जूड़ा बाँधती थीं तथा पुरुष लम्बे-लम्बे बाल तथा दाड़ी-मूँछ रखते थे।
4. इस सभ्यता के लोग आभूषणों के शौकीन थे। विविध प्रकार के आभूषण कण्ठहार, कर्णफूल, हँसुली, भुजबंध, कड़ा, अंगूठी, करधनी आदि पहने जाते थे।
5. श्रृंगार प्रसाधन के भी हड़प्पावासी शौकीन थे। मोहनजोदड़ों की नारियाँ काजल, पाउडर आदि से परिचित थीं। शीशे, कंघे एवं ताँबे के दर्पण का प्रयोग होता था। चन्हूदड़ो से लिपिस्टिक के अस्तित्व का भी संकेत मिलता है।
6. इनके आभूषण बहुमूल्य पत्थरों, हाथी दाँत, हड्डी एवं शंख आदि के बनते थे।
7. मिट्टी एवं धातुओं से निर्मित तरह-तरह के बर्तनों का प्रयोग करते थे। फर्श पर बैठने के लिए चटाइयों के साथ-साथ पलंग व चारपाई से भी परिचित थे।
8. सैंधव निवासी आमोद-प्रमोद के प्रेमी थे, पाँसा इस काल का प्रमुख खेल था।
हाथी कौतूहलजनक है। एक बैल रूपी खिलीना सिर हिलाता है। एक 9. सिन्धु घाटी में बहुत सारे खिलौने मिले हैं जो बहुत ही मिला है जिसका सिर दबाने से ध्वनि उत्पन्न होती है।
नृत्य 10. यहाँ प्राप्त नर्तकी की मूर्ति से संकेत मिलता है कि भी मनोरंजन का प्रिय साधन रहा होगा। गाने-बजाने के भी ये शौकीन थे।
11. मछली फँसाने के काँटे एवं एक मुहर पर तीर से हिरन को मारते दिखाया जाना संकेत देते हैं कि ये लोग शिकार के भी शौकीन रहे होंगे।
धार्मिक जीवन (Religious Life)-
हड़प्पा सभ्यता के धार्मिक स्वरूप के बारे में किसी भी प्रकार का लिखित साहित्य व स्मारक हमें उपलब्ध नहीं है। यहाँ हुए उत्खनन स्वरूप प्राप्त अवशेषों के आधार पर ही हम यहाँ के धार्मिक स्वरूप का अनुमान लगा सकते हैं। इनके आधार पर यहाँ के धार्मिक स्वरूप की कुछ प्रमुख विशेषताएँ निम्नवत् है
तरह 1. हड़प्पा संस्कृति में मिस्र अथवा मेसोपोटामिया की का कोई मन्दिर प्राप्त नहीं हुआ है। न ही ऐसा कोई भवन मिला है जिसे कि मन्दिर की संज्ञा दी जा सके। मातृ देवी आज दुर्गा, काली चण्डी गौरी आदि के नाम से जानी जाती है।
2. मोहनजोदड़ो एवं हड़प्पा से प्राप्त मृण्मूर्तियों को पुरातत्ववेत्ता मातृदेवी की मूर्तियाँ मानते हैं। इनसे अनुमान लगाया जा सकता है कि मातृ देवी की पूजा होती थी। माता देवी आज दुर्गा, काली, चण्डी, गोरी आदि नाम से जानी जाती है।
3. एक मूर्ति में स्त्री के गर्भ से एक पौधा निकलता हुआ दिखाया गया है जो सम्भवतः धरती देवी की मूर्ति है। अतः सम्भव है कि हड़प्पावासी धरती को उर्वरता की देवी मानकर उसकी पूजा करते थे।
4. मैके महोदय को मोहनजोदड़ो से एक ऐसी मुद्रा प्राप्त हुई है जिसमें तीन मुख वाला एक पुरुष योग मुद्रा में बैठा है। इसके तीन सींग हैं। इसके बायीं ओर एक गैंडा और भैंसा है तथा दायीं ओर एक हाथी और व्याघ्र, इसके सम्मुख एक हिरण है। इसकी तुलना पशुपति से की गई है।
5. हड़प्पा सभ्यता से बहुसंख्या में पत्थर अथवा मिट्टी से बनी लिंग-योनि की प्राप्ति लिंग पूजा के संकेत देते हैं।
6. ये लोग वृक्ष (विशेषतः पीपल की पूजा करते थे र दो जुड़वाँ पशुओं के क्योंकि मोहनजोदड़ो से प्राप्त एक मुद्रा पर दो जु शीर्ष पर 9 पीपल की टहनियाँ दिखाई गई हैं।
7. कूबड़ वाला बैल विशेष पूजनीय था।
8. नाग पूजा के संकेत मिले हैं।
9. बड़ी संख्या में प्राप्त ताबीज संकेत देते हैं कि ये लोग तन्त्र-मन्त्र में भी विश्वास करते थे।
10. मोहनजोदड़ो में वामवर्ती और दक्षिणवर्ती दोनों ही प्रकार के स्वास्तिक पर्याप्त संख्या में मिले हैं।
11. स्वास्तिक का सम्बन्ध सूर्य पूजा से हो सकता है। 12. कालीबंगान एवं लोथल से ईंटों की बनी वेदी मिली
है जो अग्नि पूजा का साक्ष्य है। कालीबंगान के हवन कुण्ड से यज्ञ का भी साक्ष्य मिलता है।
13. मृतक संस्कार पर निश्चित रूप से कुछ नहीं कहा जा सकता। मार्शल महोदय के अनुसार सिन्धु निवासी शत्रों का तीन प्रकार से उत्सर्ग करते थे-
(a) पूर्ण समाधिकरण इसमें सम्पूर्ण शब को भूमि के नीचे गाढ़ दिया जाता था।
(b) आशिक समाधिकरण इसमें पशु-पक्षियों के खाने के पश्चात् शव के बचे हुए भाग गाढ़े जाते थे।
(c) दाह कर्म-इसमें शव जला दिया जाता था एवं उसकी भस्म को गाढ़ दिया जाता था।
14. खुदाई से प्राप्त ताबीजों से पता चलता है कि ये लोग अन्धविश्वासी तथा भूत-प्रेतों में विश्वास करते थे।
आर्थिक जीवन (Economic Life)- हड़प्पा सभ्यता
से प्राप्त साक्ष्यों से वहाँ की अर्थव्यवस्था के उन्नत स्वरूप की झलक मिलती है जिसे निम्न बिन्दुओं द्वारा समझा जा सकता है-
1. कृषि (Agriculture)- कृषि हड़प्पा सभ्यता के लोगों की अर्थव्यवस्था का मूल आधार थी। खेतों की उर्वरता के कारण यहाँ अनाज की कमी नहीं थी। अनाज रखने के लिए भण्डार गृह थे। कपास की भी खेती होती थी जिससे कि लोग अपने लिए कपड़े बनाते थे। अनाज पीसने के लिए चक्कियों व कूटने हेतु ओखलियों के उपयोग के साक्ष्य मिलते हैं। सर्वप्रथम यहाँ के निवासियों ने कपास की खेती आरम्भ की। मेसोपोटामिया में यहीं से कपास जाता था जिसे कि वे ‘सिन्धु’ नाम से उच्चारित करते थे। यूनानियों ने कपास को ‘सिन्डन’ कहा जो कि सिन्धु का ही यूनानी रूपान्तर है।
यहाँ के प्रमुख खाद्यान्न गेहूँ तथा जौ थे। लोथल तथा रंगपुर (गुजरात) से धान की भूसी मिली है किन्तु धान की खेती
के स्पष्ट प्रमाण हुलास से मिलते हैं जो कि उत्तरकालीन हैं। लोथल एवं रंगपुर से ही बाजरा की खेती के भी साक्ष्य मिले हैं। हड़प्पा में मटर एवं तिल की खेती के साक्ष्य मिलते हैं। फलों में केला, नारियल, खजूर, अनार, नीबू एवं तरबूज आदि के उत्पादन के साक्ष्य मिलते हैं।
2. पशुपालन (Animal Husbandry)- कृषि के साथ-साथ हड़प्पावासियों की अर्थव्यवस्था का आधार पशुपालन भी था, इस तथ्य के भी पर्याप्त साक्ष्य मिलते हैं। यहाँ प्राप्त मुद्राओं पर अंकित बैलों से विदित होता है कि यहाँ दो प्रकार के बैल थे (1) कूबड़दार बड़े सींग वाले एवं (2) बिना कूबड़ के छोटे सींग वाले।
गाय, बैल, भेड़, कुत्ता, हाथी, सुअर, गधा एवं ऊँट इनके प्रमुख पालतू जानवर थे। कुत्ता शिकार के काम भी आता था। इनके अलावा बिल्ली, बन्दर, खरगोश, हिरण, मुर्गा, मोर, तोता, उल्लू एवं हंस आदि के चित्र भी यहाँ प्राप्त मूर्तियों, खिलौनों एवं मुहरों पर मिले हैं।
3. शिल्प तथा उद्योग-धन्धे (Handicraft and Industries) कृषि तथा पशुपालन के अतिरिक्त विविध प्रकार के शिल्प एवं उद्योग-धन्धों के प्रति भी हड़प्पा संस्कृति के लोगों का स्पष्ट रुझान दृष्टिगोचर होता है। खुदाई में प्राप्त कताई-बुनाई के उपकरणों (तकली, सुई) की प्राप्ति स्पष्ट संकेत देती है कि कपड़ा बुनना यहाँ का एक प्रमुख उद्योग रहा होगा। चन्हूदड़ी में एक कारखाना मिला जहाँ पर हार में पिरी वाले दानों का उत्पादन होता था।
कुम्भकार लोग मिट्टी के बर्तन बनाने हेतु चाक का प्रयोग करते थे, इसके अतिरिक्त हाथ से भी सामग्री बनाते थे। मोहनजोदड़ो में कुम्भकारी के मुहल्ले का भी पता चलता है।
स्वर्णकारों का व्यवसाय भी उन्नत अवस्था में था। आभूष के निर्माण में उन्होंने काफी निपुणता प्राप्त की थी। वे लोग चाँदी के आभूषणों के साथ-साथ बर्तन भी बनाते थे परन्तु मोरे के केवल आभूषण बनाये जाते थे। शंख, सीप, पौधा, हाथीदाँत से भी उपकरणों का निर्माण करना वे जानते थे।
ताँबे तथा काँसे का प्रयोग मानव एवं पशु मूर्तियाँ बनाने में किया जाता था। खुदाई में ताँबे काँसे के उपकरण बहुतायत में प्राप्त हुए हैं। इनमें घरेलू तथा कृषि सम्बन्धी उपकरण, अस्त्र-शस्त्र, बर्तन, कड़ाही तथा प्रसाधन सामग्रियाँ प्रमुखता से मिलती हैं। वे लोग धातु को पीटकर चादर बनाने की कला में परिचित थे। अतः धातु उद्योग भी काफी उन्नत अवस्था में था।
इस प्रकार हम देखते हैं कि हड़प्पा सभ्यता में शिल्प तथा उद्योग-धन्धे काफी उन्नत अवस्था में थे एवं उनके आर्थिक जीवन का प्रमुख आधार भी थे।
व्यापार तथा वाणिज्य (Trade and Com-merce) –कृषि, पशुपालन, उद्योग-धन्धों के साथ-साथ सैन्धव निवासियों की व्यापार तथा वाणिज्य में भी काफी रुचि थी। उनके आन्तरिक एवं बाह्य दोनों हो व्यापार काफी उन्नत थे। इस सभ्यता के प्रमुख स्थल हड़प्पा एवं मोहनजोदड़ों ही व्यापार के प्रसिद्ध केन्द्र थे। दोनों के बीच की दूरी 483 किलोमीटर थी किन्तु परस्पर व्यापारिक मार्गों द्वारा जुड़े हुए थे। व्यापार प्रमुखतः जलमार्ग द्वारा होता था किन्तु बलमार्गों से भी वे परिचित थे। सिक्कों का प्रचलन न होने के कारण सम्भवतः वस्तु विनिमय के माध्यम से व्यापार होता था।
सैन्धववासी तौल के लिए विभिन्न बाँटों का प्रयोग करते थे जिनमें 1, 2, 4, 8, 16, 32 एवं 64 का अनुपात होता था। सर्वाधिक प्रयोग वे 16 इकाई के बाँट का करते थे। नापने के साधनों से परिचित थे एवं दशमलव प्रणाली का प्रयोग भी जानते थे। डॉ. मैके के अनुसार यहाँ के बटखरों की तौल की प्रमाणिकता मेसोपोटामिया और इलाम के बटखरों से कहीं अधिक थी। नापने में गज (yard) का प्रयोग भी होता था।
चूंकि हड़प्पा सभ्यता के नगरों में कच्चे माल तथा प्राकृतिक सम्पदाओं का अभाव था, अतः यहाँ के निवासी पास-पड़ौस के राज्यों एवं विदेशों से इन्हें प्राप्त करते थे। उदाहरणार्थ,
सोना-अफगानिस्तान, फारस, दक्षिण भारत (कोलार खान)।
चाँदी ईरान, अफगानिस्तान।
ताँबा बलूचिस्तान, अरब, खेतड़ी (राजस्थान)।
लाजवर्द (नील रत्न) बदख्शां (अफगानिस्तान)।
सीस्सा-ईरान, अफगानिस्तान।
सेलखड़ी– बलूचिस्तान, राजस्थान।
सुलेमानी पत्बर सौराष्ट्र, पश्चिमी भारत।
प्रारम्भिक नगरों की कहाणी हडच्या सभ्यता का पुरातत्व
नीलमणि महाराष्ट्र।
अलाबास्टर बलूचिस्तान।
शंख, कौड़ियाँ सौराष्ट्र, दक्षिण भारत।
बड़ा व्यापार सम्भवतः जल मार्ग द्वारा ही किया जाता होगा। लोथल (गुजरात) से गोदीवाड़ा (बन्दरगाह) होने के प्रमाण एक बर्तन पर को देशों के साथ व्यापारिक सम्बन्धों के पर्याप्त साक्ष्य मिलते हैं।
मेसोपोटामिया से प्राप्त सिन्धु सभ्यता सम्बन्धी अभिलेखों में इसका नाम मेलूहा मिलता है। मेसोपोटामिया के पुरालेखों में सिन्धु क्षेत्र (मेलुहा) एवं मेसोपोटामिया के बीच दो मध्यवर्ती व्यापार केन्द्र दलमुन और माकन का उल्लेख है। इनमें दलमुन की पहचान फारस की खाड़ी स्थित बहरीन से की गई है। मोहन बोदड़ों में प्राप्त एक कौलदार अभिलेख में भी सैन्धव क्षेत्र एवं मेसोपोटामिया के बीच व्यापारिक सम्बन्धों की पुष्टि होती है।
इस प्रकार सैन्धववासियों का बाह्य व्यापार आन्तरिक व्यापार की तुलना में अधिक समृद्ध था जिसके यथेष्ठ प्रमाण भी उपलब्ध हैं। वस्तुतः सैन्धव सभ्यता की समृद्धि का सर्वप्रमुख कारण उनका विदेशी व्यापार ही था।
हड़प्पा सभ्यता के निर्माता:-
(Builder of Harappa Civilization)
इस सभ्यता के काल निर्धारण की तरह ही इस सभ्यता के निर्माताओं को लेकर भी विभिन्न इतिहासकारों एवं विद्वानों में मतभेद हैं।
विद्वान
के
1. डॉ. गुहा
विद्वानों के अनुसार निर्माता
– मंगोल (Mangoloid)
आग्नेय (Proto-Austroid) एवं एल्पाइन (Alpine)
अर्थात् मिश्रित जाति के लोग
2. रंगनाथ राव
– निर्माता, बहुजातीय थे जिनमें आर्य भी एक थे।
3. जी. गार्डन
– सुमेरियन
4. श्री राम प्रसाद चन्द्रा
व्यापारी वर्ग
5. डॉ. व्हीलर
11.द्रविड़
हड़प्पा सभ्यता के निर्माता द्रविड़ जाति के लोग थे, यह मत सर्वाधिक मान्य है। इन्होंने कास्य युग सभ्यता को जन्म दिया।
हड़प्पा सभ्यता के नगरों का पतन
(Downfall of Harappan Cities)
हड़प्पा सभ्यता के प्राचीन साक्ष्यों से पता चलता है कि अपने अस्तित्व के अन्तिम चरण में यह सभ्यता पतनोन्मुख रही। ई. पू. द्वितीय शताब्दी के मध्य तक यह सभ्यता पूर्णतः विलुप्त हो गई। हड़प्पा सभ्यता के काल एवं निर्माताओं की तरह ही इसके पतन को लेकर भी विभिन्न विद्वान एकमत नहीं है।
सर्वश्री मार्शल, मैके एवं एस. आर. राव हड़प्पा सभ्यता के पतन का एकमात्र कारण नदी की बाढ़ बताते हैं। चूंकि अधिकांश नगर नदियों के तट पर बसे हुए जिन प्रतिवर्ष बाढ़ आती थी। मोहनजोदड़ों एवं की चलता है कि इनका अनेक बार पुनर्निर्माण हुआ। मार्शल महोदय को मोहनजोदड़ो की खुदाई में प्रतिवर्ष माह के कारण जमा हुई बालू को परतें मिली हैं। मैके महोदय की चन्दड़ों से बाढ़ के साध्य मिले हैं। इस नगरीय सभ्यता के विनाश का प्रमुख कारण थी।
नदी में आने वाली बाढ़ को यदि पतन का प्रमुख कारण भाना जाये तो यह प्रश्न उठता है कि वे नगर जो नदियों के तटों पर अवस्थित नहीं थे, उनका पतन कैसे हुआ ? अतः निश्चित ही इस सभ्यता के पतन के लिए कुछ अन्य कारण भी उत्तरदायी रहे होंगे। इस तारतम्य में मार्टीमर व्हीलर, गार्डन चाइल्ड एवं पिगट आदि विद्वानों ने बाह्य आक्रमण को पतन का कारण माना है। पुरातात्विक साक्ष्यों से संकेत मिलता है कि मोहनजोदड़ों को लूटा गया व वहाँ के लोगों की हत्या की गई। व्हीलर के अनुसार 1500 ई. पू. आर्यों ने आक्रमण कर हड़प्पा सभ्यता के नगरों को ध्वस्त किया एवं वहाँ के लोगों को मार डाला।
आरेन स्टाइन, ए. एन. घोष आदि विद्वान जलवायु परिवर्तन को हड़प्पा संस्कृति के विनाश का कारण मानते हैं। एम. आर. साहनी जैसे भूतत्व वैज्ञानिक जलप्लावन को
इस सभ्यता के पतन का कारण मानते हैं।
माधोस्वरूप वत्स एवं एच. टी. लैम्ब्रिक के अनुसार नदियों के मार्गों में हुआ परिवर्तन इस सभ्यता के पतन का कारण बना। इनके अलावा समय-समय आने वाले भूकम्पों से भी नगरों का विनाश हुआ।
के. यू. आर. कनेडी मलेरिया एवं महामारी जैसी प्राकृतिक आपदाओं को पतन का जिम्मेदार मानते हैं।
इस प्रकार उपर्युक्त सभी कारणों ने मिलकर हड़प्पा सभ्यता के नगरों का विनाश किया। इस तारतम्य में बी. बी. लाल का यह कथन काफी उपयुक्त प्रतीत होता है कि” जलवायु परिवर्तन, प्रदूषित वातावरण तथा व्यापार में आयी भारी गिरावट के फलस्वरूप हड़प्पा सभ्यता की समृद्धि समाप्त हो गई तथा नगरीकरण का अन्त हुआ।”
विज्ञान एवं प्रौद्योगिकी
(Science and Technology)
हड़प्पा सभ्यता को एक नगरीय सभ्यता कहा गया है। नगरीय सभ्यता का हो प्रमाण है कि इस संस्कृति के निर्माताओं ने विज्ञान एवं तकनीकी के क्षेत्र में भी उल्लेखनीय प्रगति की थी। विज्ञान एवं तकनीकी प्रगति को हम निम्न बिन्दुओं के अन्तर्गत देख सकते हैं
(1) लिपि सिन्धु सभ्यता के निवासियों ने एक भाव चित्रात्मक लिपि का आविष्कार किया था। मगर यह लिपि पढ़ने में अभी तक सफलता प्राप्त नहीं हो पायी है। कई ऐसो मुद्राएँ मिली हैं जिन पर यह चित्र लिपि अंकित है।
(काठियावाड) से ताँबे एवं काँसे की कुछ वस्तुएँ मिली है। (2) धातुकर्म सिन्धु सभ्यता के एक प्रमुख स्थल लोथल मोहनजोदड़ो से भी एक 10.5 सेमी. ऊँची काँसे की एक नर्तकी बाला की मूर्ति मिली है। इससे पता चलता है कि वे कच्ची धातु से शुद्ध ताँबा निकालने की तकनीकी से परिचित थे। ताँबा चूँकि 1083°C पर पिघलता है, अतः निश्चित रूप से वे इतना ताप पैदा करने की तकनीकी से भी परिचित रहे होंगे। सम्भवतः सिन्धुवासी राजस्थान स्थित ताँबे की (सरेतड़ी) खानों से कच्ची धातु प्राप्त करते थे।
जैसा कि हम जानते हैं कि 75 से 90% तक ताँब (Cu) में 10 से 25% तक टिन (Sn) मिलाने पर कौसा तैयार होता है। अतः सिन्धु सभ्यता में काँसे की मूर्ति का मिलना इस बात का संकेत करता है कि वे लोग मिश्र धातु कौसा बनाने की तकनीक से परिचित थे।
(3) बाहन मोहनजोदड़ो से बैलगाड़ी का खिलौना मिला है जो इस बात का द्योतक है कि वे लोग आवागमन अथवा मालवाहक के उपयोग हेतु वाहन निर्माण तकनीकी से परिचित थे।
(4) गोदी एवं नौका लोथल से ईंटों से निर्मित 128 मी. लम्बी एवं 37 मीटर चौड़ी एक आयताकार गोदी (डाकयार्ड) मिली है। इससे पता चलता है कि वे नौका एवं गोदी निर्माण की तकनीकी से परिचित थे। मोहनजोदड़ो के एक बर्तन पर नाव का चित्र बना हुआ है। इन नौकाओं द्वारा विदेशों से व्यापार होता होगा। मेसोपोटामिया के एक अभिलेख में मेलुहा (सिन्ध क्षेत्र) के साथ व्यापार सम्बन्धों की चर्चा है। इसका प्रमाण यह भी है कि-
(i) लोथल से फारस की मोहरें मिली हैं, (ii) मेसोपोटामिया में हड़प्पा की शीलें मिली हैं, (iii) कालीबंगान से बेलनाकार मोहरें (मेसोपोटामिया की विशेषता थी) मिली है।
(5) माप-तौल की तकनीकी का ज्ञान हड़प्पा सभ्यता
के लोग माप-तौल की तकनीकी से परिचित थे। सिन्धु सभ्यता में करीब 150 बाँट मिले हैं। सबसे बड़ा बाँट 1375 ग्राम का एवं सबसे छोटा बाँट 0.87 ग्राम का है। वे बाँट 1, 2, 4, 8, 16, 32, 64 के अनुपात में है। यहाँ 16 के अनुपात का विशेष महत्व रहा है, 16 छटांक का 1 सेर होता था एवं 16 आने का 1 रुपया होता था।
हड़प्पावासी मापना भी जानते थे। बराबर दूरी पर माप लगे डन्डे प्राप्त हुए हैं। लम्बाई की इकाई 1 फुट थी जिसमें 37.60 सेमी. होते थे। एक हाथ की इकाई लगभग 51.8 सेमी से 53.6 सेमी. तक होती थी।
(6) नगर नियोजन मोहनजोदड़ो नगर एक योजना के अनुसार निर्मित था। सड़कें सीधी एवं चौड़ी थीं एवं एक दूसरे को समकोण पर काटती थीं। सड़क के किनारे पक्की इंटों में बनी बैंकी नालियाँ थीं। मोहनजोदड़ो में स्नानागार मिला है। अतः ये लोग पक्की ईंटों के निर्माण की तकनीक से परिचित वे एवं इन्हें रेखागणित का ज्ञान था।
(7) चिकित्सा ज्ञान-सिन्धु सभ्यता के पुरावशेषों में मोहनजोदड़ो से शिलाजीत का टुकड़ा मिला है। शिलाजीत बलवर्द्धक होने के साथ-साथ कई व्याधियों को दूर करने में सहायक है। अतः यह संभावना भी है कि सिन्धुवासी चिकित्य विज्ञान से भी परिचित रहे होंगे। कालीबंगान से एक ऐसा कपात प्राप्त हुआ है जिसको कि मस्तिष्क शोथ की बीमारी थी। अतः सम्भव है कि इस मस्तिष्क पर इस बीमारी से सम्बन्धित को शोध किया गया हो।
(8) हड़प्पावासी जलाशय, कुओं एवं नहरों द्वारा सिचाई करते थे। हड़प्पावासियों द्वारा व्यवहुत सिंचाई के र के साधन अफगानिस्तान के शोर्तुधई से नहरों के अवशेष मिले हैं धौलावीर गुजरात से ऐसे प्रमाण मिले हैं कि कृषि को सिचाई का उपयोग होता था। कुछ स्थलों से कुओं द्वारा सिचाई के चाई हेतु जलाशयों प्रमाण मिले हैं।
है, नयी धातुओं से इन लोगों ने कुल्हाड़ी, चाकू, बछीं तथा (9) हड़प्पा सभ्यता को कांस्ययुगीन सभ्यता भी कहा जाता हँसिया जैसे शस्त्रों का निर्माण किया।
SSC परीक्षा के लिए महत्वपूर्ण सामान्य ज्ञान (जीके) प्रश्न
5 मई 2026 महत्वपूर्ण करंट अफेयर्स