मौर्यकाल से गुप्तकाल तक का राजनीतिक एवं आर्थिक इतिहास
परिचय
(Introduction)
हड़प्पा सभ्यता के पश्चात् 1500 ई. पू. से 1000 ई. पू. तक भारतीय इतिहास की विषय-वस्तु ऋग्वैदिक काल पर केन्द्रित रही। इस काल में ऋग्वेद की रचना हुई थी। ऋग्वेद से इस काल की राजनीतिक एवं सांस्कृतिक स्थिति का पता चलता है। हड़प्पा सभ्यता के विपरीत वैदिक कालीन सभ्यता एक ग्रामीण सभ्यता थी। 1000 ई. पू. से 600 ई. पू. तक उत्तरवैदिक काल में तीन अन्य वेदों सामवेद, यजुर्वेद एवं अथर्ववेद की रचना हुई। इस काल में राजा निरंकुशता की ओर अग्रसर हुआ, समाज में महिलाओं की स्थिति में ह्यस हुआ एवं समाज में चतुर्वर्ण व्यवस्था स्थापित हुई। 600 ई. पू. भारत में बौद्ध एवं जैन धार्मिक आन्दोलनों का सूत्रपात हुआ। इसी दौरान 16 महाजनपद अस्तित्व में आये। इनमें कुछ जनपदों में राजतंत्र एवं कुछ जनपदों में गणतंत्र का अस्तित्व था। इनमें से मगध महाजनपद ने अत्यधिक शक्ति एवं प्रमुखता प्राप्त की। 300 ई. पू. यहीं मौर्य साम्राज्य स्थापित हुआ। मौर्य साम्राज्य से गुप्त साम्राज्य तक के राजनीतिक एवं आर्थिक इतिहास की विस्तृत विवेचना हम इस अध्याय में प्रस्तुत करेंगे।
अध्ययन के स्रोत
(Sources of Study)
मौर्यकाल से गुप्तकाल तक का इतिहास जानने के साहित्यिक एवं पुरातात्विक स्रोत प्रचुरता से उपलब्ध हैं। कौटिल्य का अर्थशास्त्र एवं मैगस्थनीज की इण्डिका जहाँ मौर्यकालीन इतिहास की जानकारी का प्रमुख स्रोत हैं, वहीं महाकवि कालिदास के रघुवंश एवं शूइक के मृच्छकटिकम से हमें गुप्तकालीन इतिहास की जानकारी मिलती है। विष्णुपुराण यदि मौर्य शासकों की जानकारी देता है तो वायुपुराण गुप्त शासकों की जानकारी का प्रमुख स्रोत है। महापण्डित राहुल सांकृत्यायन एवं काशीप्रसाद जायसवाल द्वारा सम्पादित ‘मंजुश्री मूलकल्प’ से भी (भी गुप्तकालीन इतिहास की जानकारी मिलती है। विशाखदत्त का नाटक ‘मुद्राराक्षस’ यदि मौर्यकाल की जानकारी देता है तो उसका दूसरा नाटक ‘देवी चन्द्रगुप्तम्’ गुप्तकालीन इतिहास की जानकारी उपलब्ध कराता है।
मौर्यकालीन एवं गुप्तकालीन अभिलेख इस काल के इतिहास की जानकारी के सर्वमहत्वपूर्ण एवं प्रमाणिक स्रोत हैं। मौर्य शासक अशोक महान के अभिलेख मौर्य इतिहास के प्रमाणिक स्रोत हैं। इसी प्रकार गुप्त शासक दिग्विजयी समुद्रगुप्त की जानकारी का प्रमाणिक स्रोत प्रयाग-प्रशस्ति है।
इतिहास लेखन में अभिलेखों का महत्व (Importance of Inscriptions in History Writing)
वैदिक काल के पश्चात् मौर्यकाल से पूर्व मध्यकाल तक के इतिहास लेखन में अभिलेख अत्यन्त महत्वपूर्ण सिद्ध हुये हैं। हमें उन सभी राजाओं एवं अन्य लोगों के प्रति शुक्रगुजार होना चाहिये जिन्होंने अभिलेख खुदवाकर तत्युगीन इतिहास को सुरक्षित करते हुये हम तक पहुँचाया। अभिलेख उन्हें कहा जाता है जो कि पाषाण, धातु या मिट्टी के बर्तनों आदि पर खुदे होते हैं। अभिलेखों में तत्युगीन शासक एवं उनके मातहत अपनी उपलब्धियाँ, विचार एवं क्रिया-कलाप आदि लिखवाते थे। मौर्यकालीन प्राचीन महानतम सम्राट अशोक ने भारत के विभिन्न भागों में कई अभिलेख खुदवाये। मात्र इन अभिलेखों के द्वारा ही हम सम्राट अशोक के धम्म, धम्म प्रचार के प्रयास, मानवता की सेवा के विचार आदि को भली-भाँति समझ सकते हैं। इतिहास लेखन में अभिलेख की कितनी अहम् भूमिका है इसका अन्दाज इस तथ्य से लगाया जा सकता है कि डी. आर. भण्डारकर महोदय ने तो मात्र अभिलेखों के आधार पर ही अशोक का
इतिहास लिखने का श्लाध्य प्रयास किया है। अभिलेखों का पढ़ा जाना
(Decipherment of the Script of Inscriptions)
अभिलेखों के अध्ययन को अभिलेखशास्त्र (Epigra-phy) कहते हैं। 1886 1886 ई. में भारत के पुरातत्व विभाग की अभिलेख अध्ययन शाखा की स्थापना हुई। भारत सरकार में सर्वप्रथम एपीग्राफिस्ट जर्मन विद्वान हल्टजैक थे। अक्टूबर 1887 ई. में प्रख्यात पत्रिका एपीग्राफिका इण्डिका (Epigraphic, Indica) का प्रथम संस्करण प्रारम्भ हुआ।
प्राचीनतम अभिलेख प्राकृत भाषाओं में लिखे गये। जनसामान्य की भाषा प्राकृत भाषा कही जाती थी।
सम्राट अशोक के अभिलेख- समस्त भारत में ब्राह्मी लिपि में, शहबाजगढ़ी एवं मानसेहरा (पश्चिमी पाकिस्तान) में खरोष्ठी लिपि में एवं अफगानिस्तान में आरमाइक एवं यूनानी लिपि में मुद्रित हैं। ब्राह्मी लिपि बायें से दायीं और एवं खरोष्ठी लिपि दायों और से बायर्यों और लिखी जाती थी।
अशोक के अभिलेखों का पढ़ा जाना अशोक के अभिलेखों को पढ़ने में सफलता प्राप्त करना न केवल मौर्य इतिहास अपितु प्राचीन भारतीय इतिहास लेखन के क्षेत्र में एक महत्वपूर्ण उपलब्धि थी। 1750 ई. में टीफेन्बेलर महोदय ने सर्वप्रथम दिल्ली में अशोक स्तम्भ का पता लगाया। तभी से उसके अभिलेखों के अध्ययन के प्रयास किये जाने लगे। 1830 ई. में भारतीय अभिलेखों के अध्ययन की कुछ नयी महत्वपूर्ण विधियाँ अस्तित्व में आयीं। ईस्ट इण्डिया कम्पनी की टकसाल के एक अधिकारी जेम्स प्रिंसेप ने प्राचीन शिलालेखों तथा सिक्कों में प्रयोग की गई ब्राह्मों एवं खरोष्ठी लिपियों को प्रथम बार पढ़ा। 1837 ई. में जेम्स प्रिंसेप ने अशोक के अभिलेखों का अध्ययन प्रस्तुत किया। उसने देखा कि अधिकांश अभिलेखों और सिक्कों पर पियदस्सी अर्थात् मनोहर मुखाकृति वाले राजा का नाम अंकित है। इस पियदस्सी राजा की पहचान सम्राट अशोक से की गई।
उदाहरण के लिये, अशोक के 14 शिलालेखों में से गिरनार (जूनागढ़, सौराष्ट्र) में प्राप्त तृतीय शिलालेख पर ब्राह्मी लिपि में प्रथम पंक्ति इस प्रकार है-
‘देवानपियो पियदसि राजा एवं आह’ अर्थात् ‘देवानं प्रिय प्रियदर्शी राजा ने ऐसा कहा’
अशोक के अभिलेखों में उसे तीन नामों अशोक, देवानंप्रिय प्रियदर्शी एवं राजा नाम से सम्बोधित किया गया है। मस्की (कर्नाटक) एवं गुर्जरा (दतिया, म. प्र.) से प्राप्त लघु शिलालेखों में उसका नाम अशोक दिया गया है।
अशोक के अभिलेखों का पढ़ा जाना प्राचीन भारतीय इतिहास लेखन की दृष्टि से एक क्रान्तिकारी कार्य सिद्ध हुआ जिसके द्वारा प्राचीन भारत का राजनीतिक एवं आर्थिक इतिहास समग्र रूप से प्रकाश में आया। कई अभिलेखों एवं सिक्कों में तिथि थी खुदी होती है, इससे राजनीतिक इतिहास का कालानुक्रम निर्धारित करने में अत्यधिक मदद मिलती है।
अभिलेख इतिहास के द्वार खोलते हैं (Inscription Opens the Door of the History)
प्राचीन भारतीय इतिहास के लेखन में अभिलेखों ने महत्वपूर्ण भूमिका निभाई है। प्राय: प्रत्येक काल के अभिलेख एवं साहित्यिक साक्ष्य हमें प्राप्त हुये हैं, इनके तुलनात्मक अध्ययन ने प्राचीन भारतीय इतिहास के निर्माण में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई है। यहाँ हम प्रत्येक काल के एक-एक अभिलेख की संक्षिप्त जानकारी देकर यह बताने का प्रयास कर रहे हैं कि अभिलेख किस प्रकार इतिहास के द्वार खोलते हैं
अशोक से पूर्व गौतम बुद्ध की मृत्यु के ठीक बाद 5वीं शदी ई. पू. ब्राह्मी लिपि में पिपरहवा स्तूप पर (जिला सिद्धार्थ नगर, उत्तर प्रदेश) से प्रथम बौद्ध अस्थि कलश अभिलेख मिला है। इस अभिलेख से अस्थियों की राख के ऊपर स्तूप बनाने की परम्परा का पता चलता है। मौर्य सम्राट अशोक का प्रथम शिलालेख सौराष्ट्र के जूनागढ़ जिले के गिरनार से मिला है। इसकी लिपि ब्राह्मी है। यह 272-32 ई. पू. का है। इस अभिलेख की तृतीय पंक्ति में अशोक ने निर्देश दिया है कि ‘जीव बलि के लिये नहीं मारा जायेगा’।
अशोक का 13वाँ शिलालेख शाहबाजगढ़ी से प्राप्त हुआ है। इसकी प्रथम पंक्ति में कलिंग विजय का उल्लेख है एवं 9वीं पंक्ति में अशोक के विदेशी राजाओं से सम्बन्ध की जानकारी मिलती है।
मौर्य साम्राज्य के पतन के पश्चात शुंग वंश भारत में स्थापित हुआ। । शुंग शुंग वंश के शासक भागभद्र के वेसनगर [विदिशा (म.प्र.)] अभिलेख अभिलेख से पता चलता है। है कि यवन दूत हेल्योडोरस ने तक्षशिला से आकर विदिशा में गरुण ध्वज की स्थापना की। यह अभिलेख द्वितीय शदी ई. पू. का है एवं इसकी लिपि ब्राह्मी है। इससे पता चलता है कि शुंग शासक वैष्णव मत के अनुयायी थे।
खारवेल का हाथी गुम्फा अभिलेख कलिंग राज खारवेल का यह अभिलेख पुरी (उड़ीसा) के हाथी गुम्फा से मिला है। इसकी लिपि ब्राह्मी है। यह प्रथम शदी ई. पू. के उत्तरार्द्ध का है। इसमें कलिंग के प्रसिद्ध शासक खारवेल की राजनीतिक उपलब्धियों एवं लोकमंगल कार्यों का उल्लेख मिलता है। उसने मगध तक का क्षेत्र जीत लिया था। इस अभिलेख की सर्वप्रमुख विशेषता यह है कि इसमें उसके प्रारम्भिक 13 वर्ष के जीवन की घटनाओं का क्रमबद्ध विवरण मिलता है।
नागनिका का नानाघाट गुहा अभिलेख सातवाहन
वंश के कई प्राप्त अभिलेखों में यह एक प्रमुख अभिलेख है। यह पूना के नानाघाट से मिला है। यह भी प्रथम शदी ई. पू. के उत्तरार्द्ध का है। यह भी ब्राह्मी लिपि में है। इसमें सातवाहन शासक शातकर्णि प्रथम की पत्नी नागनिका ने विभिन्न यज्ञों का विवरण दिया है। इससे सातवाहन कालीन दक्षिण भारत की राजनीतिक, धार्मिक एवं आर्थिक स्थिति का पता चलता है।
रुद्रदामन का जूनागढ़ अभिलेख -शक क्षत्रप रुद्रदामन का ब्राह्मी लिपि में जूनागढ़ (गुजरात) अभिलेख एक अत्यन्त महत्वपूर्ण अभिलेख है। इसमें सुदर्शन झील पर निर्मित बाँध का इतिहास मिलता है। सुदर्शन झील की सांगोपांग जानकारी उपलब्ध कराने वाले इस अभिलेख को प्रकाश में लाने का श्रेय जेम्स प्रिंसेप महोदय को जाता है। उन्होंने सर्वप्रथम इसे 1832 में जर्नल ऑफ एशियाटिक सोसाइटी ऑफ बंगाल के 7वें अंक में प्रकाशित कराया था। इसमें बताया गया है कि किस प्रकार रुद्रदामन के प्रान्तीय शासक सुविशाख ने सुदर्शन बाँध का पुनर्निर्माण कराया ? साथ ही इसमें रुद्रदामन की राजनीतिक उपलब्धियों का विवरण भी मिलता है। यह 150 ई. का है।
मिनान्डर का शिनकोट प्रस्तर मंजूषा अभिलेख खरोष्ठी लिपि में (115-90 ई.पू.) इण्डो-ग्रीक शासक मिनान्डर मौर्यकाल से गुप्तकाल तक का यह एक प्रमुख अभिलेख है। यह अफगानिस्तान के शिनकोट से प्राप्त हुआ है। उसकी राजधानी सकला थी जो पाकिस्तान का वर्तमान सियालकोट है।
गण्डोफरनीज का तख्त-ए-बाही प्रस्तर अभिलेख-पहलय शासक गण्डोफरनीज का यह अभिलेख पैशावर के
तख्त-ए-बाही से प्राप्त हुआ है। यह खरोष्ठी लिपि में है। कनिष्क प्रथम का सुई विहार ताम्रपत्र लेख-कुमाण शासक कनिष्ठ प्रथम का यह अभिलेख पाकिस्तान के कृएवं खरोष्ठी लिपि में है। इसमें कनिष्क कालीन धर्म की बहावलपुर के समीप सुई विहार स्तूप से मिला है। यह 89 ई. का जानकारी मिलती है।
समुद्रगुप्त का प्रयाग-प्रशस्ति स्तम्भ अभिलेख – ब्राह्मी लिपि का यह अभिलेख मूलतः कौशाम्बी में था जहाँ से इलाहाबाद किले में लाया गया। इसकी लिपि ब्राह्मी एवं भाषा संस्कृत है। इसमें कुल 33 पंक्तियाँ हैं। इसमें गुप्त सम्राट समुद्रगुप्त (335-376 ई.) का जीवन चरित्र एवं उपलब्धियों का विवरण है। इसे समुद्रगुप्त के कुमारमात्य एवं संधि विग्राहिक हरिषेण नामक काबि ने 350 ई. में उत्कीर्ण कराया। हरिषेण महादण्डनायक में में अशोक स्तम्भ पर अशोक के लेख के पुष्यभूति का पुत्र था। यह कोशाम्बी में अजाता है कि इसके नीचे मुगल सम्राट जहाँगीर का भी लेख है। इस अभिलेख को प्राचीन भारतीय अभिलेखों का सरताज कहा जा सकता है। इसमें समुद्रगुप्त की दिग्विजयों का सम्पूर्ण उल्लेख मिलता है।
समुद्रगुप्त की प्रयागप्रशस्ति की 24वीं, 25वीं एवं 26वीं पंक्ति के अंश इस प्रकार है
“समस्त पृथ्वी पर उसका कोई प्रतिद्वन्द्वी नहीं था। अनेक राजकार्यों से भूषित एवं अनेक गुणों से सम्पन्न उसने अपने पैरों तले अनेक राजाओं को कीर्ति को मिटा दिया। वह साधु (भले) की समृद्धि एवं असाधु (बुरे) के विनाश का कारण हैं। वे अज्ञेय है। उनके कोमल हृदय को भक्ति और विनय से ही वश में किया जा सकता है। वे करुणा से भरे हुए हैं। वे अनेक सहस्त्र गायों के दाता है। के उसके मस्तिष्क की दीक्षा दीन-दुखियों, विरहणियों और पीड़ितों के उद्धार के लिये की गई है। वे मानवता के लिये दिव्यमान उदारता की प्रतिमूर्ति हैं। वे देवताओं में कुबेर (धन देव), वरुण (समुद्र देव), इन्द्र। वर्षा देव) एवं यम (मृत्यु देव) के समान है।”
स्कन्दगुप्त का जूनागढ़ अभिलेख यह 456 ई. का है एवं गुजरात के जूनागढ़ में मिला है। इसमें स्कन्दगुप्त द्वारा हूणों की पराजय एवं सुदर्शन झील के बाँध के पुनर्निर्माण की जानकारी मिलती है।
सुदर्शन झील का इतिहास जानने में अभिलेखों की
भूथिका (Role of Irscription in Knowing the His tory of Sudarshan Lake)- प्राचीन भारत में मौर्यकाल में गुप्तकाल तक सिंचाई व्यवस्था हेतु तत्युगीन राजाओं द्वारा किये गये प्रयासों की जानकारी में अभिलेखों को महत्वपूर्ण भूमिका रही है। इस दृष्टि से शक अजय रुद्रदामन के जूनागढ़
अभिलेख (150) एवं शुष्ण शामक सदगुण के जूनाग अभिलेख (456 ई.) का महत्वपूर्ण स्थान है। इन दोनों अभिलेखों से हमें सुदर्शन झील एवं सिंचाई का सम्पूर्ण इतिहास प्राप्त हो जाता है। मद्रदामन के जूनागढ़ अभिलेख से पता चलता है कि ऊर्जयत पर्वत से नीचे की और बहने वाली सुवर्णसिकता एवं पलाशिनी आदि नदियों पर बाँध बना कर चन्द्रगुप्त मौर्य के प्रान्तपति पुष्यगुप्त ने सुदर्शन झील बनवाई। अशोक के यूनानी प्रान्तपति तुषास्य ने इस झील से नहरें निकलवाई। रुद्रदामन के काल में भारी वर्षा के कारण सुवर्णसिक्ता एवं पलाशिनी नदियों के तीव्र वेग ने इस झील के तटबंध को तोड़ दिया। रुद्रदामन ने इसे पुनर्निर्मित कराया एवं इसका प्रबन्ध प्रान्तपति सुविशाख को सौंप दिया। इसमें अत्यधिक धन व्यय हुआ था। चूँकि सभासदों ने इसकी मरम्मत का अत्यधिक खर्च के कारण विरोध किया था अतः रुद्रदामन ने जन कल्याण के निमित्त स्वर्य के खर्चे पर इसकी मरम्मत कराई थी। स्कन्दगुप्त के जूनागढ़ अभिलेख से पता चलता है कि 455 ई. में यह बाँध पुनः टूट गया। स्कन्दगुप्त के प्रान्तपति चक्रपालित ने उसकी आज्ञा से इसका पुनर्निर्माण कराया। इससे पता चलता है कि मौर्यकाल से लेकर गुप्तकाल तक के सभी शासक सिंचाई एवं जनकल्याण हेतु कितने समर्पित थे।
इस प्रकार हम देखते हैं कि किस प्रकार मौर्यकाल से लेकर गुप्तकाल तक का राजनीतिक एवं सांस्कृतिक इतिहास जानने में अभिलेख महत्वपूर्ण सिद्ध हुये हैं। अब हम इस काल के इतिहास की राजनीतिक एवं आर्थिक उपलब्धियों का संक्षिप्त विवरण प्रस्तुत करेंगे।
इतिहास लेखन में ग्रन्थों का विश्लेषण
(Analysis of Texts in History Writing)
इतिहास लेखन में साहित्यिक स्रोतों का विशिष्ट महत्व है। मौर्यकाल से लेकर गुप्तकाल तक का इतिहास लिखना हो तो हमें प्रचुर मात्रा में ग्रन्थ उपलब्ध हैं। इतिहासकार को इन ग्रन्थों का वैज्ञानिक दृष्टिकोण से विश्लेषण करना होता है। उसे इन ग्रन्थों विश्लेषण में निम्न पहलुओं पर विचार करना होता है-
है। 1. अधिकांश ग्रन्थ काव्य एवं नाटक के रूप में उपलब्ध उदाहरण के लिए महाकवि कालिदास के ग्रन्थ रघुवंश एवं कुमार सम्भव महाकाव्य है। कालिदास का मालविकाम्निमित्त, विशाखदत्त का मुद्रा राक्षस नाटक है। काष्य की बात करें तो कहा जाता है। ‘जहाँ न पहुँचे रवि वहाँ पहुँचे कवि’ अर्थात् काव्य में वास्तविकता कम कल्पना अधिक होती है। नाटक का तो नाम ही नाटक है अर्थात् इससे सत्य की आशा नहीं की जा सकती। अतः इतिहासकार को काव्य एवं नाटक से इतिहास निकालने के लिए अपने विवेक बुद्धि का उपयोग करना होता है।
2. तत्युगीन ग्रन्थों में वर्णित घटनाक्रम की पुष्टि अन्य समकालीन ग्रन्थों से करनी होती है।
3. पुरातत्व इतिहास की सर्वश्रेष्ठ कसौटी है. अतः साहित्यिक सोतों से प्राप्त तथ्यों की जाँच पुरातात्विक स्रोतों से करनी होती है।
की इण्डिका मौर्यकालीन इतिहास जानने का प्रमुख स्रोत है। पुरातात्विक स्रोतों में अभिलेख एवं सिक्के मौर्यकालीन इतिहास को लिखने में अत्यधिक प्रमाणिक एवं मददगार साबित हुये हैं।
चन्द्रगुप्त मौर्य (322-298 ई. पू.)- चन्द्रगुप्त मौर्य भारत में मौर्य वंश का संस्थापक था। मौर्य वंश की स्थापना चन्द्रगुप्त मौर्य ने नन्द वंश का विनाश कर की थी। यूनानी शासक सेल्यूकस निकेटर को चन्द्रगुप्त मौर्य ने परास्त किया। सेल्यूकस से संधि कर उसकी पुत्री हेलना के साथ विवाह किया। सेल्यूकस ने अपना राजदूत मैगस्थनीज चन्द्रगुप्त के दरबार में भेजा जो 305 से 298 ई. पू. तक यहाँ रहा। उसने ‘ इण्डिका’ नामक कृति लिखी। मौर्य ने एक अखिल भारतीय साम्राज्य की स्थापना की। चन्द्रगुप्त
जैन मुनि भद्रबाहु से उसने जैन धर्म की दीक्षा ली एवं 298 ई. में श्रवणबेलगोला (मैसूर) जाकर सल्लेखन (उपवास) द्वारा शरीर त्याग दिया।
बिन्दुसार’ अमित्रघात’ (298-273 ई. पू.) चन्द्रगुप्त को मृत्युपरान्त उसका पुत्र बिन्दुसार राजा बना। उसने 25 वर्ष तक राज्य किया। उसे अमित्रघात अथवा शत्रु संहारी की उपाधि मिली थी। मिस्र व सीरिया के साथ उसने मैत्री सम्बन्ध
लमगान
A शाहबाजगढ़ी
कान्धार A
मानसेहरा
तोपरा दिल्ली बैराठ
भन्
गिरनार
मीरथ
निग्लीवा रुमिन्देई
इलाहाबाद
सांची
सहसराम
सारनाथ
रूपनाथ
सोपारा
तोषाली
(धौली) जौगढ़
गोचीमठ
मस्की
कलिंग
पालकी गुण्डा ब्रह्मगिरि
येरागुडी
सिद्धपुरा
रामेश्वर
जतिंगा
शिलालेख
लघु शिलालेख
केल
A
पुत्र
A
स्तम्भ लेख
पांडय
चील
लंका
बनाये। उसके शासनकाल में तक्षशिला के गवर्नर ने विद्रोह कर दिया जिसे उसके पुत्र अशोक ने कुचल दिया था। इसके काल में तक्षशिला में दो बार विद्रोह हुआ। प्रथम विद्रोह का दमन राजकुमार अशोक व द्वितीय का राजकुमार सूसीम ने किया। यूनानी शासक एण्टिओकस का राजदूत डाइमेकस बिन्दुसार के दरबार में आया।
अशोक ‘प्रियदर्शी’ (273-236 ई. पू.)- बिन्दुसार के पश्चात् उसका पुत्र अशोक सम्राट बना। वह मौर्य वंश का तीसरा शासक था। अपने पिता के शासन काल में वह उज्जैन तथ तक्षशिला का शासक रह चुका था। देवी, तिस्यरक्षिता, कारुवाकि, आसंदिमित्रा एवं पदमावती आदि अशोक की पत्नियाँ थीं। देवी से उत्पन्न महेन्द्र एवं संघमित्रा अशोक के पुत्र-पुत्री थे। उसने 261 ईसा पूर्व कलिंग का युद्ध किया। कलिंग युद्ध के बाद अशोक के साम्राज्य में नेपाल, सम्पूर्ण उत्तरी भारत, दक्षिण भारत में मैसूर, कश्मीर के कुछ भाग, काबुल, हेरात, बलूचिस्तान तथा बैक्ट्रीया सम्मिलित हो गये। अशोक के तेर
हवें शिलालेख से पता चलता है कि उसने राज्याभिषेक के पश्चात् 8वें वर्ष में कलिंग पर विजय प्राप्त की। इस युद्ध में डेढ़ लाख लोग बन्दी
अशोक के अभिलेख
काल्सी
रामपुरवा
गुजरा
लौरिया नन्दनगढ़ लौरिया अराराज बाराबार
मौर्यकाल से गुप्तकाल तक का राजनीतिक एवं आर्थिक इतिहास
बनाये गये एवं एक लाख लोग मारे गये। इस भीषण नरसंहार को देखकर अशोक का कठोर हृदय द्रवित हो गया। उसने अब कभी भी शस्त्र ग्रहण न करने की प्रतिज्ञा की। उसने चन्द्रगुप्त द्वारा गठित सेना भंग कर दी, अब उसने युद्ध विजय के स्थान पर धम्म विजय का निश्चय किया। इस प्रकार अशोक ने साम्राज्य विस्तार की नीति के स्थान पर धम्म प्रचार की नीति अपनाई। समस्त भारत सहित विदेशों में भी धर्म प्रचारक भेजे। इसीलिये अशोक को महानतम् सम्राट कहा जाता है। अब उसके हृदय में मानवता की सेवा, जीवों के कल्याण एवं दया का भाव जागृत हुआ।
अशोक का धम्म (The Dhamma of Ashoka)-
अपने धम्म एवं उसके प्रचार के कारण ही अशोक न केवल भारत अपितु सम्पूर्ण विश्व का प्रसिद्ध व्यक्ति बन गया। अशोक अपने दूसरे स्तम्भ लेख में स्वयं प्रश्न करता है- ‘कियं चु धम्मे’ अर्थात् धम्म क्या है? इसका उत्तर भी स्वयं इस प्रकार देता है-
‘अपासिनवे बहू-कयाने दया दाने सचे सोचये चखु दाने पि मे बहुविधे दिंने दुपद
अर्थात्
पापहीनता है, अत्यधिक कल्याण है, दया है, दान है, सत्यवादिता है, पवित्रता है, मृदुता है, साधुता है।
अशोक यह भी बताता है कि धम्म पालन के लिये आवश्यक है-
(1) प्राणियों की हत्या न करना, (2) माता-पिता की सेवा करना, (3) वृद्धों की सेवा करना, (4) गुरुजनों का सम्मान करना, (5) मित्रों, परिचितों, ब्राह्मणों, श्रमणों एवं दासों के साथ अच्छा व्यवहार करना, (6) अल्प व्यय एवं अल्प संचय, (7) सादगीपूर्ण जीवन।
अशोक ने 5 दुर्गुण बताये हैं-
(1) उग्रता, (2) निष्ठुरता, (3) क्रोध, (4) गर्व, (5) ईर्ष्या। अशोक ने दूसरे एवं सातवें स्तम्भ लेख में धम्म की जो
परिभाषा दी है वह ‘राहुलोवाद सुत’ (गेह विजय) से ली गई है। वस्तुतः अशोक का धम्म आज भी प्रासंगिक है। यदि हम अशोक द्वारा बताये मार्ग पर चलें तो अपने जीवन में सफलता प्राप्त कर सकते हैं। अशोक का धर्म सभी धर्मों का सार है। यह सर्वधर्म समभाव एवं वसुधैव कुटुम्बकम की अवधारणा पर आधारित है। इसके मूल में मानवता का कल्याण है।
अशोक के धम्म का प्रचार हेतु उपाय (Measures
to Preach Dhamma of Ashoka)- गिरनार से प्राप्त तृतीय शिलालेख की द्वितीय व तृतीय पंक्ति में अशोक ने धम्म के प्रचार हेतु अपनाये उपायों को इस प्रकार लिखा है कि-है कि “मेरे सम्पूर्ण राज्य में युक्त, रज्जुक एवं प्रादेशिक प्रत्येक पाँचवें वर्ष यात्रा पर निकलें और धम्म के निर्देशों का प्रचार करें और अन्य राज्य सम्बन्धी कार्य करें।” अभिषेक के चौदहवें वर्ष अशोक ने धर्म महामात्रों की नियुक्ति की। इनका प्रमुख कार्य विभिन्न धार्मिक सम्प्रदायों के बीच बैर-भाव को समाप्त कर धर्म की एकता पर बल देना था। अशोक ने धम्म प्रचार हेतु
भारत के विभिन्न भागों में धम्म की शिक्षाओं को शिलालेखों पर उत्कीर्ण कराया।
अशोक के इन्हीं अभिलेखों के आधार पर देवदत्त रामकृष्ण भण्डारकर महोदय ने अशोककालीन इतिहास लिखा है।
अशोक ने समस्त भारत के साथ-साथ विदेशों में भी धर्म प्रचारक भेजे। दूसरे एवं तेरहवें शिलालेख में अशोक उन देशों के नाम गिनाता है जहाँ उसने अपने दूत भेजे। इनमें चोल, पांड्य, सतियपुत्र, केरलपुत्र, ताम्रपर्णि (श्रीलंका) एवं यवन राज्यों का उल्लेख मिलता है। अशोक के काल में पाटलिपुत्र में तृतीय बौद्ध संगीति का आयोजन हुआ। इस संगीति के पश्चात् विभिन्न देशों में बौद्ध धर्म के प्रचार हेतु भिक्षु भेजे। बौद्ध ग्रन्थ महावंश में इनके नाम इस प्रकार मिलते हैं-
देश
1. कश्मीर एवं गान्धार
2.
हिमालय देश
3.
वनवासी (उत्तरी कन्नड़)
4.
यवन देश
5.
अपरान्तक
6.
महाराष्ट्र
7. महिषमण्डल (मैसूर)
8.
9.
सुवर्ण भूमि
श्रीलंका
धर्म प्रचारक
मज्झन्तिक
मज्झिम
रक्षित
महारक्षित
धर्मरक्षित
महाधर्मरक्षित
महादेव
सोन एवं उत्तरा
महेन्द्र एवं संघमित्रा
इस प्रकार हम देखते हैं कि बौद्ध धर्म को एशियायी धर्म बनाने में अशोक की महत्वपूर्ण भूमिका थी। राजबलि पाण्डेय ने उचित ही लिखा है “वास्तव में बिना किसी राजनीतिक और आर्थिक स्वार्थ के धर्म के प्रचार का यह पहला उदाहरण था और इसका दूसरा उदाहरण अभी तक इतिहास में उपस्थित नहीं हुआ है।”
अशोक के अभिलेख (Ashoka’s Inscrip-tions) अशोककालीन इतिहास, साम्राज्य विस्तार एवं धार्मिक दृष्टिकोण को समझने में अशोक के अभिलेख अत्यधिक सहायक सिद्ध हुये हैं। अभी तक 40 से अधिक अभिलेख प्राप्त हुये हैं जो भारत के कोने-कोने में बिखरे हुये हैं। देवदत्त रामकृष्ण भण्डारकर महोदय ने तो मात्र अभिलेखों के आधार पर ही अशोक का इतिहास लिखा है। अशोक के अभिलेख 3 वर्गों में विभाजित हैं (1) शिलालेख, (2) स्तम्भलेख, (3) गुहालेख।
(1) शिलालेख-ये कुल 14 शिलालेख हैं जो भारत के विभिन्न स्थानों से मिले हैं। इनसे क्रमानुसार निम्न जानकारी मिलती है
(1) प्रथम अभिलेख में जीवों की बलि निषिद्ध की है।
(2) विदेशी. राज्यों से सम्बन्ध की जानकारी।
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(3) धम्म प्रचार।
(4) धम्म के उपदेश।
(5) धर्म महामात्र के कार्य।
(6) राज्य के प्रति कर्तव्य।
(7) धार्मिक दृष्टिकोण।
(8) विहार यात्रा के स्थान पर धम्म यात्रा का आरम्भ करने का उल्लेख।
(9) समारोहों पर मंगलाचारों को निरर्थक बताया।
(10) लोगों को धर्म के अनुरक्त बनाना ही सच्ची कीर्ति है।
(11) वाणी संयम पर जोर।
(12) धार्मिक सहिष्णुता पर जोर।
(13) कलिंग विजय एवं विदेश सम्बन्ध।
(14) उपसंहार, धम्मलिपि लिखवाने का उद्देश्य।
प्रथम शिलालेख जूनागढ़ जिला गिरनार, सौराष्ट्र से मिला है। जैसा कि चित्र में दिखाया गया है इसकी लिपि ब्राह्मी है।
इसकी दिखायी गई 12 पंक्तियों का हिन्दी अर्थ इस प्रकार है-
ELEGAN
レエムエムトルムシエメ
चित्र 3-गिरनार में अशोक का पहला शिलालेख
1. एवं 2. यह धम्मलिपि देवानंप्रिय प्रियदर्शी राजा (अशोक) द्वारा लिखवाई गई। यही कि कोई भी
3. जीव बलि हेतु नहीं मारा जावेगा
4. न कोई समाज (उत्सव) किया जावेगा। बहुत-सा दोष
5. समाज में देवानंप्रिय प्रियदर्शी राजा देखता है
6. एवं 7. फिर भी निश्चित प्रकार के समाज को ही देवानंप्रिय प्रियदर्शी राजा उचित मानता है। पहले रसोई में
8. एवं 9. देवानं प्रियदर्शी के लिये प्रत्येक दिन सहस्त्रों जानवर व्यंजन के लिये मारे जाते थे
10. एवं 11. पर आज से जब यह धर्म लिपि लिखाई गई तब से तीन ही प्राणी-दो मोर और एक मृग व्यंजन के लिये मारे जाते हैं
12. इनमें भी मृग का मारना निश्चित नहीं है। पीछे ये भी तीन प्राणी नहीं मारे जायेंगे।
एस बी पी डी पब्लिकेशन्स इतिहास (XII)
(2) स्तम्भलेख इनकी संख्या 6 है।
(3) गुहालेख इनकी संख्या 3 है।
मस्की (कर्नाटक), गुर्जरा (दतिया, म. प्र.) एवं नेत्तर तथा उडेगोलम (बेल्लारी, कर्नाटक) से प्राप्त लघु शिलालेखों में अशोक का नाम मिलता है।
मौर्य प्रशासन (Mauryan Administration)
मौर्य शासन प्रबन्ध चार भागों में बाँटा जा सकता है (1) केन्द्रीय शासन, (2) प्रान्तीय शासन, (3) नगर शासन, (4) ग्राम शासन।
(1) केन्द्रीय शासन-
राजा-राजा सत्ता का केन्द्र था। वह निरंकुश नहीं था। उस पर मंत्रिपरिषद् का अंकुश था। चाणक्य ने राज्य के सात अंग-राजा, अमात्य, जनपद, दुर्ग, कोष, सेना और मित्र, बताये हैं।
मंत्रिपरिषद्-इसमें 12 से 20 तक मंत्री होते थे। प्रत्येक मंत्री को 12,000 पण वार्षिक वेतन मिलता था।
अमात्य मण्डल (तीर्थ) केन्द्रीय शासन सुविधा की
दृष्टि से कई भागों में विभक्त था जिन्हें तीर्थ कहा जाता था। प्रत्येक तीर्थ (विभाग) का अध्यक्ष महामात्र (अमात्य) कहलाता था। अर्थशास्त्र में कुल 18 तीर्थों का उल्लेख है। उदाहरण के लिये एक तीर्थ का प्रधान समाहर्ता था जिसका कार्य राज्य के आय-व्यय का ब्यौरा रखना था। यह राजस्व भी एकत्रित करता था।
(2) प्रान्तीय शासन अशोक के अभिलेखों में निम्न 5 प्रान्तों का उल्लेख मिलता है
(i) उदीच्य उत्तरापथ-राजधानी तक्षशिला
(ii) अवन्ति राजधानी उज्जयनी
(iii) कलिंग-राजधानी तोसाली
(iv) दक्षिणापथ राजधानी सुवर्णगिरि
(v) प्राच्य राजधानी पाटलिपुत्र
प्रान्तों के राज्यपाल प्रायः कुमार कहलाते थे।
(3) नगर शासन मैगस्थनीज के अनुसार नगर का शासन
प्रबन्ध 30 सदस्यों का एक मण्डल करता था जो 6 समितियों में विभक्त था। प्रत्येक समिति में 5 सदस्य होते थे।
(i) शिल्पकला समिति,
(ii) वैदेशिक समिति,
(iii) जनसंख्या समिति,
(iv) वाणिज्य व्यवसाय समिति,
(v) वस्तु निरीक्षक समिति,
(vi) कर समिति।
(4) ग्राम शासन ग्राम का मुखिया ग्रामिक या ग्रामिणी कहलाता था। ग्राम में एक प्रशासनिक अधिकारी भोजक होता था।
प्रान्त मण्डल में, मण्डल अहार (जिले) में विभक्त था।
मौर्यकाल से गुप्तकाल तक का राजनीतिक एवं आर्थिक इतिहास
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सैन्य व्यवस्था-सेना के 6 विभाग थे पैदल सेना, अश्व सेना, हाथी सेना, रथ सेना, नौसेना एवं सैन्य यातायात विभाग। मौर्यों के पास एक विशाल सेना थी। राजा अपनी सेना का कमाण्डर-इन-चीफ होता था।
न्यायालय-सम्राट न्याय का सर्वोच्च अधिकारी था।
(i) धर्मस्थीय न्यायालय- दीवानी न्यायालय थे, इनमें राजस्व सम्बन्धी मामले आते थे।
(ii) कण्टकशोधन न्यायालय इनमें मारपीट, झगड़े वाले फौजदारी मामले आते थे।
गुप्तचर व्यवस्था-सुव्यवस्थित गुप्तचर व्यवस्था थी-
(i) संस्था-एक स्थान पर रहने वाले गुप्तचर।
(ii) संचारण-साधु अथवा छद्म वेश में घूमने वाले
गुप्तचर।
राजस्व-भूमिकर उपज का 1/6 या 1/4 होता था।
(i) दुर्ग-नगरों से प्राप्त आय दुर्ग कहलाती थी।
(ii) राष्ट्र-जनपद की आय।
(iii) सेतु-फूल व खेत से प्राप्त आय।
(iv) ब्रज-मवेशियों से प्राप्त आय।
मौर्यकालीन अर्थव्यवस्था (Mauryan Economy)
कृषि-यह एक कृषि प्रधान अर्थव्यवस्था थी। चन्द्रगुप्त मौर्य ने सुदर्शन झील का निर्माण कराया। अशोक ने सिंचाई हेतु इससे नहरें निकलवाई। चाणक्य के अर्थशास्त्र में भी सिंचाई के अनेक साधनों का उल्लेख मिलता है। कृषि के साथ-साथ पशुपालन भी प्रचलित था।
व्यापार-आन्तरिक एवं बाह्य दोनों व्यापार प्रचलित थे। सीरिया, मिस्र एवं पश्चिमी देशों के साथ पश्चिम में भड़ौंच एवं पूर्व में ताम्रलिप्त बन्दरगाह से समुद्र मार्ग द्वारा व्यापार होता था।
आन्तरिक व्यापार सड़क द्वारा एवं नदियों द्वारा गोता था। मार्ग निर्माण अधिकारी एग्रोनोमोई कहलाता था। ताम्रलिप्ति से पुष्कलावती तक जाने वाला मार्ग उत्तरापथ कहलाता था। इस मार्ग पर पाटलिपुत्र, काशी, प्रयाग, कौशाम्बी एवं तक्षशिला स्थित थे।
उद्योग-कपड़ा उद्योग प्रमुख उद्योग था। बंगाल का मलमल प्रसिद्ध था। इसके अलावा बढ़ईगिरी, चर्म उद्योग एवं धातु उद्योग भी प्रमुख थे। कौटिल्य के अनुसार वस्त्र उद्योग के केन्द्र काशी, वत्स, मदुरा और बैंगी में थे।
सिक्के (Coins) बुद्ध काल में आहत (पंचमार्क) सिक्के चलते थे। अब मौर्यकाल में चलने वाले स्वर्ण सिक्के निष्क, चाँदी के सिक्के कर्षापण एवं ताँबे के काकिणि कहलाते थे। टकसाल का अध्यक्ष लक्षणाध्यक्ष एवं मुद्राओं का परीक्षण करने वाला अधिकारी ‘रूपदर्शक’ कहलाता था। सिक्कों के साथ-साथ वस्तु विनिमय भी प्रचलित था।
मौर्यकालीन कला एवं स्थापत्य (Mauryan Art and Architecture)
राजप्रासाद-पाटलिपुत्र में चन्द्रगुप्त मौर्य का राजप्रासाद वास्तुकला का बेजोड़ उदाहरण था। फाह्यान के अनुसार, “यह प्रासाद मानव कृति न होकर देवों द्वारा निर्मित है।”
स्तूप-बौद्ध परम्परा के अनुसार अशोक ने 84,000 स्तूप बनवाये थे। यह अतिश्योक्ति हो सकती है मगर ह्वेनसांग ने 80 स्तूपों को स्वयं अपनी आँखों से देखा था। साँची का स्तूप मौर्य वास्तुकला का उत्कृष्ट उदाहरण है।
लोककला मौर्ययुगीन लोककला का सर्वोत्तम उदाहरण विशाल यक्ष-यक्षणी की प्रतिमाएँ हैं। इनमें मथुरा जिले के परखम ग्राम से प्राप्त यक्ष मूर्ति ‘मणिभद्र’ एवं. पटना के दीदारगंज से प्राप्त चवरधारिणी की यक्ष प्रतिमा महत्वपूर्ण हैं।
श्रेणियाँ (Guilds) मौर्यकाल में व्यवसायी एवं शिल्पी श्रेणियों (Guilds) में संगठित थे। इनका शिल्पियों के जीवन व कार्य पर नियन्त्रण था। इनके माल पर सरकार 10% कर लेती थी। साहूकार जो ऋण देते थे उस पर 15% व्याज लेते थे।
सामाजिक जीवन (Social Life) मैगस्थनीज के
अनुसार लोगों का नैतिक जीवन ऊँचा था। लोग अपने घरों में ताला नहीं लगाते थे। सत्य बोलते थे, चोरियाँ कम होती थीं। समाज में स्त्रियों की स्थिति ठीक थी। जीवन स्तर ऊँचा था। धनी परिवारों में बहु-विवाह प्रचलित थे।
शिक्षा एवं साहित्य (Education and Litera-
ture) तक्षशिला शिक्षा का प्रधान केन्द्र था। सम्भवतः चन्द्रगुप्त मौर्य स्वयं तक्षशिला का ही छात्र था। तर्कशास्त्र, त्रयी (तीनों वेद), वार्ता, कृषि, पशुपालन एवं व्यापार तथा दण्ड नीति चार प्रकार की शिक्षाओं का उल्लेख अर्थशास्त्र में मिलता है। कौटिल्य का अर्थशास्त्र, सुबन्धु की वासवदत्ता, अभिधम्म पिटक इस युग की प्रमुख साहित्यिक कृतियाँ हैं।
शुंग वंश (The Shunga)
मौर्य वंश के अन्तिम शासक बृहद्रथ को मारकर उसके प्रधान सेनापति पुष्यमित्र शुंग ने 184 ई. पू. शुंग वंश की स्थापना को। पुष्पमित्र वीर योद्धा, योग्य सेनापति, चतुर कूटनीतिज्ञ तथा एक महान शासक था। ये ब्राह्मण थे। इसने 36 वर्ष (148 ई. पू.) तक शासन किया। इसने दो चार अश्वमेघ यज्ञ किया था। शुंग वंश के अन्तिम शासक देवभूति को मारकर उसके मंत्री वसुदेव कण्व ने 72 ई. पू. कण्व वंश की स्थापना की। वंश के सिमुक ने मगध की राजसत्ता अपने हाथ में ले ली। इस कण्व वंश के अन्तिम शासक सुशर्मा को परास्त कर सातवाहन सातवाहन वंश में 19 शासक हुए, सिमुक इनमें सबसे महत्वपूर्ण शासक था।
और भारत पर उत्तर-पश्चिम दिशा से विदेशी आक्रमण हुये। भारत में व्याप्त इस अराजकता का लाभ विदेशियों ने उठाया
1 ब्रजेश कुमार श्रीवास्तव, विचारों का इतिहास, 2007 आगरा, पृ. 73.
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विदेशी आक्रमण
(Foreign Invasion)
अशोक के समकालीन चीनी सम्राट शी-ह्वांग-ती (246-211 ई. पू.) ने हूणों के आक्रमण से चीन की रक्षा करने हेतु चीन में विश्वप्रसिद्ध महादीवार का निर्माण कराया। हूण अब चीन जा नहीं सकते थे। अतः उन्होंने पश्चिम की ओर रुख किया। उन्होंने शक जाति को वहाँ से खदेड़ा। शकों ने अपने पड़ोसी बैक्ट्रिया के यूनानियों को खदेड़ा। इस प्रकार ये यूनानी भारत पर आक्रमण करने को मजबूर हुये। इस प्रकार भारत के उत्तर-पश्चिमी सीमान्त से पहले यूनानियों ने भारत पर आक्रमण किया, फिर पर्धिया के पहलव आये, उनके बाद शक आये एवं उनके पीछे कुषाण एवं हूण भारत आये।
कुछ विद्वानों का कहना है कि चूँकि अशोक ने अपने धर्म प्रचारक विभिन्न देशों में भेजे थे अतः उसे चीन में महादीवार बनने का पता चला होगा। साथ ही यह भी कि यह दीवार हूण आक्रमण से रक्षार्थ बनाई जा रही है। अतः यदि वह भी दूरदर्शिता का परिचय देते हुये भारत के उत्तर-पश्चिमी सीमान्त पर ऐसी महादीवार बनवा देता तो भारत भी उन विदेशी आक्रमणों से सुरक्षित रह सकता था।
इण्डो-ग्रीक (हिन्द-यूनानी)
(Indo-Greek)
भारत पर आक्रमण करने वाला सर्वप्रथम शासक डेमेट्रियस था जिसने पंजाब का एक बड़ा भाग जीता था। इनमें सर्वप्रसिद्ध शासक मिनाण्डर (166-145 ई. पू.) था जो मिलिन्द के नाम से भी जाना जाता था। उसने अपने साम्राज्य का विस्तार अफगानिस्तान, पंजाब, काठियावाड़, सिन्ध राजपूताना तथा मथुरा तक किया। नागसेन (नागार्जुन) ने इसे बौद्ध धर्म में दीक्षित किया। ‘मिलिन्दपन्हो’ नामक ग्रन्थ में मिनाण्डर द्वारा पूछे गये प्रश्नों के नागार्जुन द्वारा दिये गये उत्तरों का संग्रह है। भारत में सर्वप्रथम सोने के सिक्के जारी करने का श्रेय इण्डो-ग्रीक को जाता है। ये हेलोनिष्टिक कला के भारत में जन्मदाता थे। गान्धार कला इसका उदाहरण है। मिनाण्डर की राजधानी सकला (स्यालकोट) थी।
पर्थियन (Parthians)
इण्डो-ग्रीक के पश्चात् पर्थियन (पहलव) हिन्दुकुश और सुलेमान पर्वत को पार कर भारत में आये। इन्होने यहाँ आकर भारतीय संस्कृति में अपने को आत्मसात कर लिया। इनके शासक गोडोफर्नीज ने 25 वर्ष भारत पर (48-20 ई. पू. के लगभग) शासन किया। उसके राज्य में कंधार, काबुल एवं तक्षशिला शामिल थे। कहा जाता है कि ईसाई पादरी सेंट थामस इसी के काल में भारत आया था।
शक (The Sakas)
शक घुमन्तू जाति के लोग थे, यू ची (Yeuh-chi) नामक
एस बी पी डी पब्लिकेशन्स इतिहास
(XII)
अन्य घुमन्तू जाति के दूसरे लोगों ने इन्हें इनकी मातृभूमि से खदेड़ दिया था। सिन्धु को अपनी शक्ति का केन्द्र बनाकर शकों ने भारत के अन्य भागों पंजाब, काठियावाड़, सौराष्ट्र, उज्जयनी एवं मथुरा पर अधिकार किया। इन्होंने क्षत्रप प्रणाली लागू की। रुद्रदामन इनका प्रसिद्ध शासक था। महाक्षत्रप रुद्रदामन का गिरनार अभिलेख हमें सुदर्शन झील की मरम्मत की जानकारी देता है। उसने गुजरात, मालवा, कच्छ, सिन्ध एवं कॉकण पर शासन किया। उसने कभी भी नाजायज कर नहीं लगाये ना ही गलत तरीकों से धन कमाया। इसने यौधेयाँ एवं सातवाहन नरेश वशिष्ठीपुत्र पुलमावी को परास्त किया। इसकी मृत्यु के पश्चात् शर्को का पतन हो गया।
सातवाहन
(The Satavahana)
ये विदेशी न होकर स्वदेशी मूल के थे। कण्व वंश के अन्तिम शासक सुशर्मा को मारकर सिमुक ने सातवाहन वंश की स्थापना 60 ई. पू. की। सातवाहनों ने गोदावरी व कृष्णा नदियों के बीच स्थित क्षेत्र को जीता, जो आंध्र प्रदेश कहलाता है। इन्हें आन्ध्र सातवाहन भी कहा जाता है। सम्भवतः इनके समय माता का विशेष महत्व था। इसीलिये सभी शासकों के नाम के आगे माता का नाम मिलता है। सातवाहन काल के राजाओं द्वारा कई अभिलेख स्थापित किये गये जो इनके इतिहास पर प्रकाश डालते हैं।
शातकर्णी प्रथम लगभग 20 ई. पू. शासक बनने वाला शातकर्णी प्रथम सातवाहन वंश का सर्वप्रतापी राजा था। इसकी पत्नी नागनिका ने पूना के पास नानाघाट अभिलेख लिखाया। इसमें दो अश्वमेघ यज्ञ एवं दान-दक्षिणा का उल्लेख है। शातकर्णी ने बरार व मध्य प्रदेश को जीता।
गौतमी पुत्र शातकर्णी- यह भी एक महान शासक था। नासिक गुहालेख में उसके साम्राज्य विस्तार को इंगित करते हुये लिखा है कि ‘उसके घोड़े तीन समुद्र का पानी पीते थे’। इसने लगभग 24 वर्ष (106-130 ई.) तक शासन किया। उसने मालवा, काठियावाड़, गुजरात तथा राजपूताना के कुछ भागों को जीता।
वशिष्ठी पुत्र पुलुमावी (130-154 ई.)- इसका
विवाह रुद्रदामन की पुत्री से हुआ था। इसने नासिक गुहालेख लिखाया जिसमें गौतमी पुत्र शातकर्णी की विजयों का उल्लेख है। यज्ञश्री शातकर्णी के पश्चात् सातवाहन वंश का पतन हो गया।
कुषाण वंश
(The Kushanas)
चीन में महादीवार बनने के कारण हूणों ने अपने पड़ोसी कबीले यूची को पश्चिम की ओर खदेड़ा। कुषाण इसी यूची कबीले की एक शाखा थी। भारत में कुजुल कडफिसस (15 ई.-65 ई.) ने कुषाण वंश की स्थापना की। इसके बाद शैव
मौर्यकाल से गुप्तकाल तक का राजनीतिक एवं आर्थिक इतिहास
मतावलम्बी विम कडफिसस (65-78 ई.) शासक बना। कुषाण वंश का महानतम शासक कनिष्क था जो 78 ई. में सम्राट बना एवं 101 ई. तक शासन किया। कनिष्क ने चीन को विजित किया। चीन से दो राजकुमार भारत आये जिन्होंने भारत में नाशपाती एवं आडू की खेती आरम्भ की। कनिष्क ने कश्मीर में कनिष्कपुर नगर बसाया। उसके द्वारा किये जाने वाले युद्धों से तंग आकर उसके ही सेनापतियों ने (बौद्ध साहित्य के अनुसार) उसको मार डाला। कनिष्क के बाद कुषाण वंश का अन्त यौधेयों द्वारा किया गया। यौधेयों का अन्त कर गुप्त वंश भारत में स्थापित हुआ।
आर्थिक जीवन (Economic Life)- कुषाणकालीन अर्थव्यवस्था का प्रमुख स्रोत इनका रेशम मार्ग पर नियन्त्रण था। यह रेशम मार्ग (Silk Route) चीन से रोम तक जाता था। रोम भारत से मसाले, मोती, मलमल, हाथीदाँत की वस्तुएँ, औषधियाँ, चन्दन एवं इत्र आदि आयात करता था। बदले में भारत को अत्यधिक मात्रा में स्वर्ण मिलता था जो कि भारत की समृद्धि का प्रमुख कारण था। रोम भारत से विलासिता की सामग्री मँगाने में प्रतिवर्ष दस करोड़ सेस्टर्स (Sesosters) खर्च करता था। रोमन युवतियाँ भारतीय मलमल की दीवानी थीं। कुषाणों ने भारत में अत्यधिक मात्रा में शुद्ध सोने के सिक्के जारी किये।
धार्मिक जीवन (Religious Life)- कनिष्क बौद्ध धर्म का अनुयायी था। अशोक की तरह उसने भी एशिया एवं चीन में बौद्ध धर्म का प्रसार कराया। उसके समय ही कश्मीर के कुण्डलवन में चतुर्थ बौद्ध संगीति का आयोजन हुआ था। उसके समय बौद्ध धर्म की महायान शाखा का प्रभाव बढ़ा। अब बुद्ध की प्रतिमा बनने लगी एवं मूर्ति पूजा आरम्भ हुई। प्रसिद्ध बौद्ध विद्वान अश्वघोष, वसुमित्र एवं नागार्जुन उसके दरबार की शोभा थे। अश्वघोष ने संस्कृत में’ बुध चरित’, वसुमित्र ने ‘महाविभास’, नागार्जुन ने ‘मध्यमिका सूत्र’ लिखे। चिकित्सक चरक भी उसके दरबार में थे। चरक ने चरक संहिता लिखी।
कला एवं स्थापत्य (Art and Architecture) कुषाण काल में बौद्ध कला की अत्यधिक प्रगति हुई। अनेक स्तूप एवं विहारों का निर्माण कराया गया।
कनिष्क ने कला की गान्धार एवं मधुरा शैली को प्रोत्साहन दिया। मथुरा शैली का एक सुन्दर उदाहरण यहाँ प्राप्त कनिष्क की एक सिरविहीन प्रतिमा है। जैसा कि चित्र में दिखाया गया है यह एक खड़ी मूर्ति है।
इसकी विशेषताएँ निम्नानुसार हैं-1.
कनिष्क घुटने तक का कोट पहने है।
2. पैरों में जूते हैं।
3. दायें हाथ में गदा तथा बायें हाथ में तलवार है।
4. पाषाण निर्मित इस मूर्ति में मानव शरीर का यथार्थ चित्रण किया गया है।
चित्र 4-मथुरा में प्राप्त कनिष्क की सिरविहीन मूर्ति (1) गान्धार कला शैली
(Gandhara School of Art)
कुषाण काल में विकसित कला की गान्धार शैली को ग्रीको-रोमन, ग्रीको-बुद्धिष्ट, हिन्दू-यूनानी आदि नामों से भी पुकारा जाता है। इस कला-शैली का मुख्य केन्द्र भारत के उत्तर-पश्चिमी सीमा क्षेत्र में स्थित गान्धार क्षेत्र था। गान्धार कला शैली पर निःसन्देह यूनानी, रोमन अथवा हैलेनिक (हैलेनिस्टिक) कलाओं का प्रभाव था परन्तु इस कला का विकास भारत में यूनानियों अथवा रोमनों ने नहीं किया वरन् कला के क्षेत्र में उनकी परम्परा को निभाने वाले शकों एवं कुषाणों ने किया। कनिष्क के समय में महात्मा बुद्ध की बहुसंख्यक मूर्तियों का निर्माण होना प्रारम्भ हुआं। इस समय जो मूर्तियाँ बर्नी उनमें से अधिकांश मूर्तियों में स्वदेशी और विदेशी प्रभावों का सम्मिश्रण था। इस प्रभाव के अन्तर्गत बनी हुई मूर्तियाँ भारत के गान्धार प्रदेश पेशावर के निकट का काबुल घाटी का निम्न भाग और सिन्धु घाटी का ऊपरी भाग में पायी गयीं एवं इस कला शैली का विकास भी यहीं हुआ। इसी कारण इसे गान्धार शैली के नाम से जाना जाता है।
गान्धार शैली के अन्तर्गत बुद्ध की मूर्तियों को इतना सुन्दर बनाने का प्रयत्न किया गया था कि वे यूनानियों के सौन्दर्य देवता ‘अपोलो’ की भाँति लगती हैं। वस्तुतः गान्धार कला के तहत बुद्ध ए
वं बोधिसत्वों की बहुसंख्यक मूर्तियों का निर्माण हुआ। ये ध्यान, पद्मानसन, धर्म चक्र प्रवर्तन, वरद हस्त तथा अभय आदि मुद्राओं में हैं। इसके साथ-साथ बुद्ध के जीवन तथा पूर्व जन्मों से सम्बन्धित विविध घटनाओं के दृश्यों-बुद्ध के जन्म,
1 ब्रजेश कुमार श्रीवास्तव, ‘मौर्य व मौर्योत्तर कालीन भारत में व्यापार एवं संचार माध्यमों का विकास’, संधान-4, झाँसी, 2006, पृ.
महाभिनिष्क्रमण, सम्बोधि, धर्म-चक्र-प्रवर्तन, महापरिनिर्वाण आदि का अंकन गान्धार शैली में दृष्टिगोचर होता है।
गान्धार मूर्ति कला के निर्माण विषय महायान सम्प्रदायों की परम्पराओं, धर्म पुस्तकों तथा कहानियों से लिये गये हैं। गान्धार मूर्ति कला से हमें महायान धर्मानुयायिओं के विश्वास एवं परम्परा का भी ज्ञान होता है। गान्धार कला शैली में प्रत्येक वर्ग एवं विभिन्न रीति-रिवाजों को भी उत्कीर्ण किया गया है। इस शैली में निर्मित कुछ दृश्य अत्यन्त कारुणिक एवं प्रभावोत्पादक हैं। तपस्यारत बुद्ध का एक दृश्य, जिसमें उपवास के कारण उनका शरीर अत्यन्त क्षीण हो गया है, गान्धार कला के सर्वोत्तम नमूनों में से है। इसमें तपस्वी के शरीर का यथार्थ चित्रण है। नसीं तथा पसलियों को अत्यन्त कुशलतापूर्वक उभारा गया है जबकि पेट अन्दर भैंसा हुआ है। इसके बावजूद मुख-मण्डल की शान्ति दृढ़ इच्छा शक्ति को प्रकट करती है।
बुद्ध के अलावा जो बोधिसत्वों की इस शैली की मूर्तियाँ मिली हैं, उनमें अधिकांश मैत्रेय की हैं। मैत्रेय के अलावा अवलोकितेश्वर एवं पदमपाणि की भी मूर्तियाँ मिली हैं। गान्धार शैली की अधिकांश मूर्तियाँ लाहौर तथा पेशावर के संग्रहालयों में सुरक्षित हैं। इन मूर्तियों की एवं गान्धार शैली की कुछ प्रमुख विशेषताएं ऐसी हैं, जिनके आधार पर वे भारतीय कला से स्पष्टतः पृथक् की जा सकती है। ये विशेषताएँ निम्नलिखित हैं-
1. मानव शरीर के यथार्थ चित्रण की ओर विशेष ध्यान दिया गया है। इनमें मानव शरीर की सुन्दर रचना एवं माँस-पेशियों की सूक्ष्मता परिलक्षित होती है। मूँछों एवं लहरदार बालों का भी अत्यन्त सूक्ष्म ढंग से प्रदर्शन हुआ है।
2. बुद्ध की वेशभूषा यूनानी है, उनके पैरों में जूते दिखाये गये हैं, प्रभा-मण्डल सादा तथा अलंकरण रहित है।
3. शरीर से अत्यन्त सटे अंग-प्रत्यंग दिखाने वाले पारदर्शी वस्त्रों का अंकन हुआ है, जिनमें सलवटें तक स्पष्ट देखी जा सकती हैं।
4. अनुपम नक्काशी भी इस शैली की विशेषता है।
मूर्तियों के सिर पर घुँघराले बाल दिखाये गये हैं, अतः बुद्ध की मूर्ति यूनानी देवता अपोलो की तरह लगती है। डॉ. ए. एल. वाशम के अनुसार, “गान्धार शिल्पियों ने यूनानी रोमन संसार के देवताओं को अपना आदर्श माना। कभी-कभी उनकी प्रेरणा पूर्णतया पश्चिमी प्रतीत होती है।”।
गान्धार कला में सुन्दरता भले ही हो मगर इनमें वह सहजता तथा भावात्मक स्नेह नहीं है जो भरहूत, साँची, बोधगया अथवा अमरावती की मूर्तियों में दृष्टिगोचर होता है। वस्तुतः गान्धार कला में आध्यात्मिकता तथा भावुकता न होकर बौद्धिकता एवं शारीरिक सौन्दर्य को ही प्रधानता दी गयी है। अतः डॉ. मजूमदार
द्वारा ठीक ही कहा गया है कि “गान्धार शैली के कलाकार के पास यूनानी हाथ तो था, मगर एक भारतीय का हृदय नहीं था।” (“The Gandhara artists had the hand
of a Greek but the heart of an Indian”) गान्धार कला अपने यूनानी स्वरूप के कारण भारतीय कला की मुख्य धारा से पृथक् रही तथा इसका क्षेत्र पश्चिमोत्तर प्रदेश तक ही सीमित रहा। गान्धार कला भारतीय कला को व्यापक रूप से प्रभावित करने में पूर्णतः असमर्थ रही, जबकि भारत के बाहर गान्धार कला का व्यापक प्रभाव परिलक्षित होता है। इसने चीनी, तुर्किस्तान, मंगोलिया, कोरिया तथा जापान की बौद्ध कला को जन्म दिया। इस तारतम्य में मार्शल महोदय का यह कथन काफी उपयुक्त प्रतीत होता है कि “यूनानी तथा रोमन कलाओं ने गान्धार शैली को जन्म देने के अतिरिक्त भारतीय कला के ऊपर कभी भी वैसा प्रभाव उत्पन्न नहीं किया जैसा कि इटली अथवा पश्चिमी एशिया की कला के ऊपर।
गान्धार कला की मूर्तियाँ स्लेटी पाषाण, चूने तथा पकी मिट्टी से बनी हुई थीं। यद्यपि इन मूर्तियों का प्रधान विषय बौद्ध धर्म से सम्बन्धित है मगर इसमें ब्राह्मण देवी-देवताओं का भी प्रदर्शन हुआ है। गान्धार कला शैली की दृष्टि से विदेशी होते हुए भी इसकी आत्मा भारतीय है। मार्शल महोदय के अनुसार, गान्धार की पाषाण कला का चतुर्थ सदी ई. के प्रारम्भ में ह्रास हो गया था।
(2) मथुरा कला शैली
(Mathura School of Art)
कुषाण शासक कनिष्क, हुविष्क तथा वासुदेव के काल में मथुरा कला का सर्वोत्कृष्ट विकास हुआ। मथुरा शैली का आरम्भ ए. एल. वाशम के अनुसार सम्भवतः ई. पू. प्रथम शताब्दी के अन्त में हुआ। यद्यपि कुछ विद्वान इसकी तिथि और बाद में निर्धारित करते हैं। ईसा की पहली सदी से प्रगति करती हुई इस शैली ने आगे आने वाले समय में उत्तर भारत की मूर्ति कला की शैलियों में श्रेष्ठ स्थान प्राप्त किया। गुप्त काल में विकसित श्रेष्ठ मूर्ति कला शैली को वस्तुतः मथुरा कला शैली का ही विकसित स्वरूप माना गया है। मथुरा शैली में निर्मित मूर्तियाँ पश्चिम में तक्षशिला और मध्य एशिया तक तथा पूर्व में श्रावस्ती और सारनाथ तक भेजी जाती थीं।
प्रारम्भ में यह माना जाता था कि मथुरा शैली का विकास गान्धार की बौद्ध मूर्तियों के प्रभाव एवं अनुकरण से ही हुआ था परन्तु शोधों द्वारा अब यह निश्चित रूप से सिद्ध हो चुका है कि थीं तथा उनका आधार मूल रूप से भारतीय ही था। प्रारम्भ में मथुरा की बौद्ध मूर्तियाँ गान्धार कला से सर्वथा भिन्न एवं स्वतन्त्र अनेक यूरोपीय विद्वानों का मानना था कि सर्वप्रथम बुद्ध की मूर्ति गान्धार कला में ही निर्मित हुई परन्तु अब भारतीय विद्वानों ने यह स्पष्ट कर दिया है कि बुद्ध की मूर्ति सर्वप्रथम मथुरा कला में ही बनी।
1 अद्भुत भारत, 1992, पृष्ठ 307।
2 ए गाइड टू तक्षशिला, पृष्ठ 43।
मौर्यकाल से गुप्तकाल तक का राजनीतिक एवं आर्थिक इतिहास
इस बात के पर्याप्त प्रमाण हैं कि ई. पू. प्रथम शताब्दी में मथुरा भक्ति आन्दोलन का केन्द्र बन गया था। संकर्षण, वसुदेव, कृष्ण, बलराम आदि की प्रतिमाओं के साथ-साथ इस समय जैन तीर्थकरों की प्रतिमाओं का भी विकास हो चुका था। यही नहीं, मथुरा में लोक कला के तहत यक्ष-यक्षणी की भी विशाल प्रतिमाएँ निर्मित हुईं। इसका प्रभाव निश्चित रूप से बौद्ध धर्म पर भी पड़ा होगा। कनिष्क के काल में चतुर्थ बौद्ध संगीति के पश्चात् जब महायान सम्प्रदाय का उदय हुआ तो इसमें बुद्ध की मूर्ति रूप में पूजा किये जाने का विधान था और मथुरा में बन रही विभिन्न धर्मों की मूर्तियों को देखते हुए बौद्धों को भी बुद्ध को मानव रूप में देखने की आवश्यकता प्रतीत हुई होगी और इस प्रकार अन्ततोगत्वा मथुरा कला के अन्तर्गत ही पहले बोधिसत्व और बाद में प्रथम बार बुद्ध की मूर्ति निर्मित की गयी होगी।
मथुरा और गान्धार शैली में एक अन्तर यह भी है कि मथुरा से कुछ ऐसी बोधिसत्व प्रतिमाएँ मिली हैं जिन पर कनिष्क सम्वत् की प्रारम्भिक तिथियों में लेख खुदे हैं। इसके विपरीत गान्धार कला की मूर्तियों में से एक पर भी कोई परिचित सम्वत् नहीं है और कुछ मूर्तियों पर जो तिथियाँ दी गयी हैं, वे पहली से तीसरी सदी ई. की हैं। अतः इस दृष्टि से मथुरा की बौद्ध प्रतिमाएँ प्राचीनतम सिद्ध होती हैं। कुछ विद्वानों के अनुसार गान्धार कला ने पद्मासन, ध्यान, नासाग्रदृष्टि आदि प्रतीकात्मक लक्षण मथुरा के शिल्पियों से ही ग्रहण किये होंगे क्योंकि इन प्रतीकात्मक लक्षणों का स्त्रोत भारत ही था, न कि ईरान अथवा यूनान।
मथुरा कला की विशेषता का प्रधान कारण यह था कि यहाँ के कलाकारों ने मूर्तियों के निर्माण में निजी परम्पराओं को अपनाया। वस्तुतः मथुरा कला का उदय सांची, सारनाथ और भरहूत की स्वदेशी कला के सूत्र को लेकर हुआ। मथुरा कला शैली में निर्मित मूर्तियों की प्रमुख विशेषताएँ निम्नलिखित हैं-
1. मथुरा के पड़ोस में रूपवास तथा अन्य खानों में बहुत बढ़िया लाल बलुआ पत्थर बहुतायत में मिलता था और मूर्तियाँ भी इसी पत्थर से निर्मित हैं।
2. बुद्ध की प्रतिमाओं के चेहरे ओर दिव्य प्रकाश को चक्र द्वारा प्रदर्शित करने का प्रयत्न मथुरा शैली के अन्तर्गत ही आरम्भ हुआ।
3. इस कला के मुख्य नमूने इन्द्रिय सुख और सौन्दर्य से व्याप्त स्त्रियों की मूर्तियाँ हैं। स्त्रियों के गोल व सुडौल वक्ष एवं भारी व उभरे हुए कूल्हे न केवल स्त्री की प्रजनन शक्ति के प्रतीक हैं अपितु स्त्री शरीर के सौन्दर्य को भी प्रदर्शित करते हैं।
4. महात्मा बुद्ध प्रायः मुण्डित शीश हैं, उनके मुख पर मूँछें भी नहीं हैं।
5. मूर्तियों का एक कन्धा खुला व एक बँका है।
6. मथुरा शैली यथार्थ की अपेक्षा आदर्श, प्रतीकात्मक तथा आध्यामिकता एवं भावना-प्रधान है।
7. इस शैली के तहत बुद्ध तथा बौधिसत्वों (मैत्रेय, काश्यप, अवलोकितेश्वर आदि) की खड़ी तथा बैठी मुद्रा में
बनी हुई मूर्तियाँ मिली हैं। इनके व्यक्तित्व में चक्रवर्ती तथा योगी दोनों का ही आदर्श देखने को मिलता है।
8. बुद्ध के जन्म, अभिषेक, महाभिनिष्क्रमण, सम्बोधि, धर्म-चक्र-प्रवर्तन, महापरिनिर्वाण आदि उनके जीवन की विविध घटनाओं का कुशलतापूर्वक अंकन इस शैली में किया गया है।
9. यहाँ के कलाकारों ने ईरानी तथा यूनानी कला के कुछ प्रतीकों को भी ग्रहण कर उन पर भारतीयता का रंग चढ़ाया है।
मथुरा शैली का एक सुन्दर उदाहरण यहाँ से मिली कनिष्क की एक सिरविहीन मूर्ति है। यह खड़ी मुद्रा में है। इसमें कनिष्क घुटने तक कोट पहने है, पैरों में जूते हैं, दायें हाथ में गदा एवं बायें हाथ में तलवार है। पाषाण निर्मित इस मूर्ति में मानव शरीर का यथार्थ चित्रण दर्शनीय है। इस मूर्ति को मथुरा के संग्रहालय में रखा गया है। ए. एल. वाशम के अनुसार, “मथुरा के मूर्तिकारों ने अपनी बौद्ध मूर्तियों के लिए एक ओर तो प्रारम्भिक शताब्दियों की हृष्ट-पुष्ट यक्ष की मूर्तियों से और दूसरी ओर ध्यानावस्थित जैन तीर्थंकारों की मूर्तियों से प्रेरणा प्राप्त की। समस्त कला को शास्त्रीय सिद्धान्तों की कसौटी पर कसे जाने पर यह शैली भारतीय कला की सर्वश्रेष्ठ शैली समझी जाती थी।” मथुरा कला की एक और मूर्ति काशी में रखी गयी है। यह मूर्ति एक दासी की है जिसके दांये हाथ में कुछ प्रसाधन सामग्री तथा बांये हाथ में एक टोकरी है जो एक मालदार महिला के श्रृंगार के लिए तत्परता से खड़ी है।
अमरावती शैली
(Amravati School of Art)
कुषाणकालीन मथुरा एवं गान्धार शैली से पृथक् दक्षिण भारत में एक पृथक् अमरावती शैली का विकास हुआ। यह शैली द्वितीय शताब्दी के उत्तरार्द्ध में कृष्णा और गोदावरी नदी के मुहानों पर विकसित हुई। अमरावती शैली भरहूत, गया और सांची तथा बाद में गुप्त और पल्लव कला को जोड़ने वाली कड़ी है। इस कला की प्रमुख विशेषता यह है कि इसमें बौद्ध प्रतिमाओं के साथ-साथ स्त्री-पुरुषों की मूर्तियों की प्रधानता है। यहाँ के कलाकारों का आदर्श था ‘कला को कला के लिए’। अतः हाव-भाव और शारीरिक सौन्दर्य की दृष्टि से ये मूर्तियाँ समकालीन सभी मूर्तियों से श्रेष्ठ मानी जा सकती हैं। स्त्री, सौन्दर्य भाव, मुद्रा आदि मथुरा शैली से भी श्रेष्ठ है। मूर्तियाँ आकार की दृष्टि से भी विशाल हैं। मूर्तियाँ में वैराग्य एवं भक्ति को भी प्रदर्शित किया गया है। इस शैली की एक और प्रमुख विशेषता सफेद संगमरमर का प्रयोग था।
अमरावती की कला में पशुओं और पुष्पों का अभूतपूर्व चयन हुआ है। इस शैली की एक अपनी विशेषता यह है कि यह शैली अपने देश की मिट्टी में उत्पन्न हुई, वर्धित हुई और कलाकारों ने समाज तथा धर्म से प्रेरणा ली।
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गुप्त साम्राज्य
(Gupta Empire)
इतिहास जानने के स्त्रोत (Sources of Knowing History) अभिलेखों ने गुप्तकालीन इतिहास के निर्माण में भी महत्वपूर्ण भूमिका निभाई है। हरिषेण की प्रयागप्रशस्ति समुद्रगुप्त कालीन इतिहास पर विस्तार से प्रकाश डालती है। स्कन्दगुप्त के भीतरी अभिलेख से स्कन्दगुप्त द्वारा हूणों की पराजय का पता चलता है। 510 ई. के भानुगुप्त के एरण (सागर, म. प्र.) अभिलेख से पता चलता है कि गुप्तकाल में सती प्रथा प्रचलित थी। यह भारत में सती प्रथा का प्रथम अभिलेखीय प्रमाण है। सुविख्यात अभिलेखशास्त्री डी. सी. सरकार ने ठीक ही लिखा है कि, ” भारतीयों के जीवन, संस्कृति और गतिविधियों का ऐसा कोई पक्ष नहीं है जिसका प्रतिबिम्ब अभिलेखों में नहीं हो।”
वायु पुराण, विशाखदत्त के मुद्राराक्षस, शूद्रक के
सासनियन साम्राज्य
कुषाण तथा शक
यौधेय
अर्जुनायन
माल
दारापुर
(मंदसौर
गिरिनगर
गिरिनार
पद्मावती
सांची
अरब
सागर
कामरूप
ने
मृच्छकटिकम, वात्सयायन का कामसूत्र एवं महाकवि कालिदास के ग्रन्थ गुप्तकालीन इतिहास की जानकारी के प्रमुख साहित्यिक स्रोत हैं। चीनी यात्री फाह्यान एवं ह्वेनसांग के विवरण भी गुप्तकालीन इतिहास पर प्रकाश डालते हैं।
चन्द्रगुप्त प्रथम (319-350 ई.)- गुप्त वंश का संस्थापक श्रीगुप्त (275 ई.) था। इसके बाद घटोत्कच ने 319 ई. तक राज्य किया। चन्द्रगुप्त प्रथम (319-350 ई.) गुप्त वंश का सर्वप्रथम शक्तिशाली शासक था। इसे गुप्त संवत् 320 ई. का प्रवर्तक माना जाता है।
समुद्रगुप्त पराक्रमांक (350-375 ई.)- चन्द्रगुप्त की पत्नी लिच्छवि कुमार देवी का पुत्र समुद्रगुप्त गुप्त वंश का सर्वप्रतापी सम्राट था। हरिषेण की प्रयागप्रशस्ति के अनुसार उसकी दिग्विजय का प्रमुख उद्देश्य ‘घरणिबन्ध’ अर्थात् समस्त पृथ्वी को जीतना था। प्रयाग-प्रशस्ति के अनुसार उसकी दिग्विजय निम्नानुसार थी-
(1) आर्यावर्त विजय मनुस्मृति में पूर्वी समुद्र से लेकर
गुप्त साम्राज्य की स्थापना व प्रसार
नेपाल
परिवाजक
– पाटलिपुत्र
नन्दीवर्धन
वाकाटक साम्राज्य
बंगाल
की खाड़ी
(iv
शालकायन
चन्द्रगुप्त प्रथम का साम्राज्य
समुद्रगुप्त द्वारा जोड़े गये क्षेत्र
अस्थायी रूप से समुद्रगुप्त के आश्रित राज्य
सिंहल (लंका)
चित्र 5-गुप्त साम्राज्य की स्थापना व प्रसार
pol बोना भारत मगर 375 ये चा महाद्वी था. मा
गंग
मौर्यकाल से गुप्तकाल तक का राजनीतिक एवं आर्थिक इतिहास
पश्चिमी समुद्र तक एवं विंध्याचल हिमालय पर्वत के बीच का क्षेत्र आर्यवर्त कहा गया है। इस अभियान में उत्तर भारत के 9 राजाओं को समुद्रगुप्त ने परास्त किया। ये नौ शासक रुद्रदेव, मतिल, नागदत्त, चन्द्रवर्मा, गणपति नाग, नागसेन, नन्दि, अच्युत एवं बलवर्मा थे।
(2) आटविक राज्यों की विजय फ्लीट महोदय के अनुसार उत्तर प्रदेश के गाजीपुर जिले से म. प्र. के जबलपुर जिले के वन प्रदेश में ये आटविक राज्य विस्तृत थे। इन आटविक राज्यों की संख्या 18 थी। इन राज्यों को जीत कर सेवक बनाया गया।
(3) दक्षिणापथ की विजय दक्षिणापथ से तात्पर्य उत्तर में विध्य पर्वत से लेकर दक्षिण में कृष्ण तुंगभद्रा नदी प्रदेश तक का क्षेत्र है। प्रयाग-प्रशस्ति की 19वीं एवं 20वीं पंक्ति में समुद्रगुप्त द्वारा जीते गये दक्षिणापथ के 12 राजा इस प्रकार दिये हैं
(i) कौशल का महेन्द्र, (ii) महाकान्तर का व्याघ्रराज,
(iii) केरल का मण्टराज, (iv) पिस्टपुर का महेन्द्रगिरि,
(v) कोट्टूर का स्वामीदत्त, (vi) एरण्डपल का दमन, (vii) काँची का विष्णुगोप, (viii) अवमुक्त का नीलराज, (ix) वेगी का हस्तिवर्मा, (x) पल्लक का अग्रसेन, (xi) देवराष्ट्र का कुबेर, (xii) कुस्थलपुर का धनंजय।
इन राज्यों को जीतकर इनके साथ ‘सर्वकर ग्रहण मोक्षानुग्रह’ की नीति अपनाई। अर्थात् उपहार व कर प्राप्त कर उनका राज्य उन्हें वापस लौटा दिया गया।
(4) सीमावर्ती राज्य समतट, कामरूप, डवाक, कतृपुर एवं नेपाल पाँच सीमान्त राज्यों पर विजय प्राप्त की। साथ ही साम्राज्य की पश्चिमा व उत्तरी-पश्चिमी सीमा पर स्थित 9 गणराज्यों को जीता। ये मालव, अर्जुनायन, यौधेय, मद्र, आभीर, प्रार्जुन, सनकानिक, काक एवं खरपरिक आदि थे।
(5) परराष्ट्रनीति-प्रयाग-प्रशस्ति की 23वीं एवं 24वीं पंक्ति में बताया है कि समुद्रगुप्त के साथ कुछ विदेशी शक्तियों ने निम्न संधियाँ कीं-
(i) आत्म-निवेदन (मैत्री का स्वतः प्रस्ताव),
(ii) कन्योपायन (कन्याओं का उपहार),
(iii) दान (स्थानीय वस्तुओं की भेंट),
(iv) गरुण मुद्रा से अंकित राजाज्ञा पाने की याचना। नेपोलियन से तुलना (Comparison with Na-
poleon) विसेण्ट स्मिथ महोदय ने समुद्रगुप्त की उक्त दिग्विजयों को देखते हुये उसकी तुलना फ्रांस के सम्राट नेपोलियन बोनापार्ट (1769-1821 ई.) से की है। उन्होंने समुद्रगुप्त को भारत का नेपोलियन कहा है। वस्तुतः यह तुलना तो सही है मगर उनका कथन गलत है। चूँकि समुद्रगुप्त का काल (350-375 ई.) नेपोलियन से 1400 वर्ष पूर्व का है अतः उन्हें कहना ये चाहिये था कि नेपोलियन यूरोप का समुद्रगुप्त था। वैसे भी महाद्वीपीय व्यवस्था के पश्चात् नेपोलियन का पराभव हो गया था, मगर समुद्रगुप्त अन्त तक दिग्विजयी रहा।
समुद्रगुप्त की प्रतिभा बहुमुखी थी। एक सिक्के से पता चलता है कि उसने अश्वमेघ यज्ञ किया था। दूसरे सिक्के में उसे वीणा बजाते दिखाया गया है जो उसके संगीत प्रेम को इंगित करता है।
रामगुप्त सागर (म. प्र.) के एरण से प्राप्त सिक्कों से रामगुप्त की ऐतिहासिकता सिद्ध होती है। कहा जाता है कि रामगुप्त एक कायर राजा था। शक शासक ने उसे परास्त कर एक अपमानजनक संधि करने को बाध्य किया। इसके तहत उसे अपनी पत्नी ध्रुवदेवी को शक राजा को भेंट करना था। रामगुप्त के छोटे भाई चन्द्रगुप्त ने कुल की मर्यादा की रक्षा की। वह ध्रुवदेवी का छद्मवेश बनाकर शक राजा के पास गया और उसकी हत्या कर दी। बाद में उसने कुल कलंक रामगुप्त की भी हत्या कर स्वयं उसकी पत्नी (अपनी भाभी) ध्रुवदेवी से विवाह कर लिया।
चन्द्रगुप्त द्वितीय ‘विक्रमादित्य’ (375-414 ई.)-
समुद्रगुप्त की प्रधान राजमहिषी दत्तदेवी का पुत्र चन्द्रगुप्त द्वितीय एक शक्तिशाली सम्राट था। विक्रमादित्य उसकी उपाधि थी। उसने नाग राजकुमारी ‘कुबेरनागा’ से विवाह किया था। इनकी पुत्री प्रभावती गुप्त थी। प्रभावती गुप्त का विवाह बकाटक रुद्रसेन द्वितीय से हुआ। चन्द्रगुप्त ने वाकाटकों की सहायता से काठियावाड़ के शकों का अन्त किया। दिल्ली में कुतुबमीनार के समीप स्थित लौह स्तम्भ पर अंकित ‘चन्द्र’ सम्भवतः इसी शासक का है।
नवरत्न-चन्द्रगुप्त द्वितीय अपनी सांस्कृतिक उपलब्धियों के लिये प्रसिद्ध है। इसके दरबार के 9 रत्न थे-
(1) शंकु,
(2) क्षपणक,
(4) बेताल भट्ट,
(7) कालिदास,
(5) वराहमिहिर,
(8) अमरसिंह,
(3) घटकर्पर,
(6) वररुचि,
(9) धन्वन्तरि।
वह स्वयं वैष्णव मतावलम्बी था। अन्य धर्मों के प्रति सहिष्णु था। उसका संधि विग्राहक वीरसेन शैव था। उसका सेनापति आम्रकार्दव बौद्ध था। पाटलिपुत्र एवं उज्जयनी उसकी दो राजधानियाँ थीं।
प्रसिद्ध चीनी यात्री फाह्यान इसी के समय भारत आया। 399 से 414 ई. तक उसने भारत के विभिन्न भागों में भ्रमण किया।
कुमारगुप्त प्रथम (415-455 ई.) वह चन्द्रगुप्त द्वितीय का पुत्र था। इसका काल शांति व सुव्यवस्था का काल था। मन्दसौर में रेशम काटने वाली एक श्रेणी के अभिलेख से इसके द्वारा की गई मालवा विजय का पता चलता है। पश्चिमी मालवा में उसके राज्यपाल बन्धुवर्मा ने एक सूर्य मन्दिर का निर्माण कराया। वह विष्णु पूजक था।
था। इसके समय भारत पर हूण आक्रमण हुये। हूणों को इसने स्कन्दगुप्त (455-467 ई.)- यह कुमारगुप्त का पुत्र परास्त किया। हूणों को पराजित करने वाला स्कन्दगुप्त भारत ही नहीं सम्पूर्ण एशिया एवं यूरोप का प्रथम वीर था। इसके जूनागढ़ अभिलेख से सुदर्शन झील की मरम्मत का पता चलता है। इस अभिलेख से यह भी पता चलता है कि वह एक योग्य, विचारशील, दयावान, लोकहितकारी एवं प्रजावत्सल शासक था।
यह गुप्त साम्राज्य का अन्तिम महान शासक था। इसके पश्चात् गुप्त साम्राज्य धीरे-धीरे पतन की ओर अग्रसर हुआ। स्कन्दगुप्त के पश्चात् हृण आक्रमण जारी रहे।
सागर के पास स्थित एरण अभिलेख से पता चलता है कि हुण शासक तोरमाण ने 500 ई. के पश्चात् एरण प्रदेश पर अधिकार कर लिया। तोरमाण पुत्र मिहिरकुल प्रथम बार परास्त हुआ मगर दूसरी बार उसने गुप्त साम्राज्य को हिला दिया। उधर मालवा के यशोधर्मन ने अन्तिम गुप्त सम्राटों का अधिकांश भाग छीन लिया जो गुप्तों के पतन का मूल कारण बना।
गुप्त प्रशासन (Gupta’s Administration)
सम्राट-सम्राट प्रधान न्यायाधीश, सर्वोच्च सेनापति होता था। प्रयाग-प्रशस्ति में समुद्रगुप्त को देवता कहा गया है।
अमात्य तथा मंत्री विभिन्न विभाग विभिन्न मंत्रियों के
अधीन होते थे। एक मंत्रिपरिषद् होती थी। संधि विग्राहक मंत्रिपरिषद् का प्रमुख सदस्य होता था। हरिषेण एक साथ संधि विग्राहक, कुमारामात्य एवं महादण्डनायक था। उसका पिता ध्रुवभूति महादण्डनायक था।
राज्य का विभाजन निम्न प्रकार था-
प्रान्त (भुक्ति) भोग (कमिश्नरी) विषय (जिला)
→ वीथि (तहसील) मण्डल (ग्राम समूह)।
वाणिज्य, व्यापार एवं नये नगर (Trade, Com-
merce and New Cities) – गुप्त काल में व्यापार प्रगति पर था। पाटलिपुत्र, वैशाली, उज्जैन, दशपुर, भड़ॉच, प्रतिष्ठान, विदिशा, प्रयाग, मथुरा, अहिछत्र तथा कौशाम्बी आदि प्रसिद्ध नगर एवं व्यापारिक केन्द्र थे। चन्द्रगुप्त द्वितीय ने उज्जैन को अपनी राजधानी बनाया। शूद्रक के मृच्छकटिकम से ज्ञात होता है कि उज्जैन में अनेक धनाढ्य श्रेष्ठी एवं सौदागर निवास करते थे। लम्बी-चौड़ी सड़कों द्वारा वे सभी नगर आपस में जुड़े हुये
थे। सड़कों द्वारा आन्तरिक व्यापार प्रगति पर था।
बंगाल के ताम्रम्म्रलिप्त बन्दरगाह से मालवाहक जहाज मलय प्रायद्वीप, लंका, चीन एवं अन्य पूर्वी देशों को नियमित जाया करते थे। आन्तरिक क्षेत्र में गंगा, ब्रह्मपुत्र, नर्मदा, गोदावरी, कृष्णा एवं कावेरी नदियों से भी व्यापार होता था। गुप्तकाल की प्रमुख विशेषता मालवाहक जहाज थे। कुछ जहाजों में तो 500 व्यक्ति तक बैठ सकते थे। पश्चिम में भाँच बन्दरगाह से समुद्री व्यापार होता था। दक्षिण-पूर्वी एशिया एवं पश्चिमी एशिया के विभिन्न देशों के साथ व्यापार प्रगति पर था। भारत से कपड़े, बहुमूल्य पत्थर, हाथीदाँत की वस्तुएँ, गरम मसाले, नारियल, सुगन्धित वस्तुएँ, नील एवं जड़ी-बूटियाँ इत्यादि निर्यात की जाती थीं। भारतवासी बाह्य देशों से प्रायः घोड़ा, सोना, मूँगा, कपूर, रेशम का धागा एवं नमक आदि आयात करते थे।
गुप्तकाल के पतन के साथ भारत के पश्चिमी देशों के साथ व्यापार में भी गिरावट आयी। रेशम बुनकरों की एक श्रेणी लाट प्रदेश छोड़कर दशपुर जाकर बस गई। वैजन्तियों ने चीन से रेशम के कीड़े पालने की विधि सीख ली। इससे भी व्यापार में कमी आयी।
सामाजिक जीवन (Social Life)
भी छुआछूत व्यवस्था प्रचलित थी। चाण्डालों को लकड़ी की आवाज करते हुये चलना पड़ता था ताकि लोगों को पता चल सके कि वह चाण्डाल है। चार आश्रम के आधार पर समाज चार वर्षों-ब्राह्मण, क्षत्रिय, वैश्य एवं शूद्र में विभाजित था। ऐसे उदाहरण भी मिले हैं जबकि क्षत्रियों ने निचले वर्ग के व्यवसाय को अपनाया। वैश्य एवं शूद्रों ने अपने से उच्च वर्ग के व्यवसाय को अपनाया। फिर
अन्तर्जातीय व अन्तर्वर्णीय विवाह प्रचलित हो गये थे। विदेशी भी भारत में घुल-मिल गये। दास प्रथा प्रचलित थी। संयुक्त परिवार प्रथा प्रचलित थी। बहु विवाह प्रथा प्रचलित थी मगर स्त्रियाँ दूसरा विवाह नहीं कर सकती थीं। सागर के पास एरण से प्राप्त 510 ई. के भानुगुप्त के एरण अभिलेख से पता चलता है कि सती प्रथा प्रचलित थी।
शिक्षा एवं साहित्य (Education and Litera-ture)- शिलालेखों के अनुसार अध्यापक को आचार्य एवं उपाध्याय कहा जाता था। आचार्य को दक्षिणा दी जाती थी। नालन्दा एवं वल्लभी उच्च शिक्षा के प्रसिद्ध केन्द्र के रूप में विकसित हो रहे थे। नालन्दा में विदेशों से भी छात्र अध्ययन हेतु आते थे। चीनी यात्री इत्सिंग के अनुसार यह विश्वविद्यालय 200 ग्रामों से प्राप्त आय से चलता था। ये ग्राम इसे दान में मिले थे। यहाँ 300 कमरे व 8 हॉल थे। इनमें 10,000 विद्यार्थी पढ़ते थे।
कालिदास, भारवि, विशाखदत्त, वात्सयायन आदि ने उच्च कोटि के साहित्य का सृजन किया। कालिदास के ग्रन्थ रघुवंश, कुमारसंभव, विक्रमोवर्शीयम, मालविकाग्निमित्र, मेघदूत, ऋतुसंहार एवं अभिज्ञानशाकुन्तलम आज भी विश्व प्रसिद्ध साहित्य बने हुए हैं।
गुप्तकाल में संस्कृत साहित्य का विकास
(Progress of Sanskrit in Gupta Age)
संस्कृत साहित्य के विकास की दृष्टि से गुप्तकाल अत्यन्त महत्वपूर्ण था। इस काल में संस्कृत साहित्य अपने चरमोत्कर्ष पर था। गुप्त शासकों ने संस्कृत को राजदरबार की भाषा बनाया। सभी दस्तावेज व लेख संस्कृत में ही लिखे जाते थे। बराहमिहिर ने खगोलशास्त्र, भूगोल तथा जन्तु विज्ञान के विषय में ‘वृहत् संहिता’ में विस्तार से लिखा है। आर्यभट्ट महान गणितज्ञ व खगोलशास्त्री थे। संस्कृत के प्रख्यात साहित्यकार कालिदास इसी काल की देन हैं। उनके द्वारा सृजित संस्कृत ग्रन्थ
मौर्यकाल से गुप्तकाल तक का राजनीतिक एवं आर्थिक इतिहास
अभिज्ञानशाकुन्तलम, मेघदूत, ऋतुसंहार, रघुवंश, कुमार सम्भव, विक्रमोवर्शीयम, माल- विकाग्निमित्रम, अत्यन्त महत्वपूर्ण ग्रन्य हैं। कालिदास के अलावा भारवि, विशाखदत्त, ईश्वरकृष्ण, वात्सायन, आर्यभट्ट एवं बराहमिहिर आदि ने संस्कृत साहित्य की उत्कृष्ट कृतियों का सृजन किया।
विज्ञान एवं प्रौद्योगिकी (Science & Technology)
गणित एवं विज्ञान-गुप्तकालीन गणितज्ञ आर्यभट्ट (376-500 ई.) दशमलव पद्धति से परिचित थे। ये पटना के रहने वाले थे। इन्होंने सर्वप्रथम बताया कि पृथ्वी गोल है। पृथ्वी अपनी धुरी पर घूमती है। ग्रहणों का कारण पृथ्वी और चन्द्रमा की बदलती परिस्थितियाँ हैं। आर्यभट्ट ने आर्यभट्टीयम ग्रन्थ लिखा। उन्हें क्षेत्रमिति, ज्यामिति एवं त्रिकोणमिति का जन्मदाता माना जाता है। बराहमिहिर भी गुप्तकाल के महान खगोलशास्त्री थे। इन्होंने वृहत् संहिता लिखी। इन्होंने बताया कि चन्द्रमा पृथ्वी का चक्कर लगाता है। बराहमिहिर मगध निवासी थे मगर बाद में उज्जैन आ गये थे।
चन्द्रगुप्त द्वितीय के काल में धन्वन्तरि महान वैद्य थे। मेहरौली का लौह स्तम्भ धातुकला विज्ञान की प्रगति का प्रमाण है। यह 24 फुट ऊँचा है जिसका घेरा 16.4 इंच है एवं इसका भार लगभग 6 टन है। आज तक इसमें जंग नहीं लगी है।
कला एवं स्थापत्य (Art and Architecture)
गुप्तकाल में कला एवं स्थापत्य का अत्यधिक विकास हुआ। गुप्तकाल के प्रसिद्ध मन्दिर निम्न हैं-
(i) एरण का विष्णु मन्दिर, सागर (म. प्र.)
(ii) तिगवा का विष्णु मन्दिर, जबलपुर (म. प्र.)
(iii) नचना कुठार का पार्वती मन्दिर, अजयगढ़ (पन्ना (म. प्र.)]
(iv) भूमरा का शिव मन्दिर, सतना (म. प्र.)
(v) देवगढ़ का दशावतार मन्दिर, ललितपुर (उ. प्र.)
(vi) सिरपुर का लक्ष्मण मन्दिर, रायपुर (छत्तीसगढ़)
स्तूप-सारनाथ का धामेख स्तूप एवं राजग्रह स्थित जरासंघ की बैठक स्थापत्य के श्रेष्ठ उदाहरण हैं। एक ग्राहकाला औरंगाबाद में अजन्ता एवं ग्वालियर के
पास बाध की गुफाएँ गुप्तकालीन चित्रकला का सर्वश्रेष्ठ उदाहरण प्रस्तुत करती हैं। अजन्ता की गुफा नं. 16 में मरणासन्न राजकुमारी का चित्र अत्यन्त सुन्दर है। 17वीं गुफा में माता एवं शिशु का चित्र आकर्षक है।
सिक्के एवं शासक
(Coins and The King)
ई. पू. का एक गोलाकार स्वर्ण पत्तर मिला है, जिसे प्रो. के. डी. प्राचीन भारतीय इतिहास के लेखन में अभिलेखों की तरह ही सिक्के भी अत्यन्त उपयोगी सिद्ध हुये हैं। सिक्कों पर आधारित अध्ययन मुद्राशास्त्र कहलाता है। प्ररण उत्खनन में लगभग 1000
वाजपेयी मुद्रा मानते हैं। छठी शदी ई. पू. आहत सिक्के या पंचमार्क सिक्के चलते थे। इन पर ठप्पा लगाकर अर्द्ध चन्द्र, मोर आदि के चित्र बनाये जाते थे। सागर (म. प्र.) के पास एरण से शक शासकों के सिक्के ढालने के लगभग 400 साँचे मिले हैं।
शासकों की मूर्ति एवं नाम वाले सिक्के भारत में जारी करने का श्रेय इण्डो-ग्रीक शासकों को जाता है। कुषाण शासकों द्वारा सोने के सिक्के काफी मात्रा में जारी किये गये। इनका आकार एवं वजन तत्युगीन रोमन सम्राट एवं ईरानी शासकों द्वारा जारी सिक्कों के बराबर था। इससे इनके बीच व्यापार का पता चलता है। आरम्भिक गुप्त सिक्कों का सोना अत्यन्त खरा था। इससे इनकी आरम्भिक समृद्धि का पता चलता है।
समुद्रगुप्त के एक सिक्के में उसे वीणा बजाते दिखाया है एवं एक में ‘अश्वमेघ पराक्रम’ अंकित है। इससे उसके संगीत प्रेम एवं धर्म में रुचि का पता चलता है।
समुद्रगुप्त के सिक्कों पर उसे व्याघ्र मारते तो दिखाया गया है, मगर किसी भी सिक्के पर शेर मारते नहीं दिखाया गया। चूँकि शेर उस समय सौराष्ट्र के जंगलों में थे अतः सम्भवतः सौराष्ट्र पर समुद्रगुप्त ने विजय हासिल नहीं की थी। चन्द्रगुप्त द्वितीय के सिक्कों पर प्रथम बार उसे शेर मारते दिखाया गया है। इससे पता चलता है कि उसने सौराष्ट्र पर विजय प्राप्त कर ली थी एवं ‘सिंह विक्रम’ की उपाधि प्राप्त की थी।
इस प्रकार इतिहासकार सिक्कों का उपयोग कर इतिहास का लेखन करते हैं।
गुप्त काल-भारत का स्वर्णयुग
(Gupta Period-The Golden Age of India)
स्वर्ण अर्थात् सोना एक ऐसी बहुमूल्य एवं सुन्दर धातु है जो प्रत्येक व्यक्ति को पसन्द होती है। भारतीय परम्परा में कृत युग को मानव इतिहास का स्वर्णयुग माना जाता है अर्थात् इस युग का समाज सम्पन्नता, सुख एवं हर तरह के वैभव से सम्पन्न था। इतिहास लेखन की ग्रीको-रोमन अवधारणा में यूनानी कवि हेसिओड ने युगचक्रवादी परम्परा में मानव इतिहास के सबसे अच्छे युग को स्वर्णयुग की संज्ञा दी है। इसके अनुसार स्वर्ण युग मानव की श्रेष्ठतम स्थिति से सम्बद्ध है।2
इससे पता चलता है कि स्वर्ण काल उस काल को कहते हैं कि जिस काल में उस देश की संस्कृति अपने चरमोत्कर्ष पर रही है इतिहास में कई युग आते जाते हैं, इनमें जिस भी युग में मानव सर्वाधिक सामाजिक, सांस्कृतिक एवं भौतिक उन्नति करता है, उस युग को ही स्वर्ण युग की संज्ञा दी जाती है। यूनान में ऐथेन्स का स्वर्ण युग पेरेक्लीज (443-429 ई. पू.) के युग को कहा जाता है। रोमन सभ्यता का स्वर्ण युग वहाँ के शासक आगस्टस (31 ई. पू. से 14 ई. पू.) के युग को कहा जाता है। क्षेत्रों में अभूतपूर्व प्रगति की थी। पेरीक्लीज युग आदि अपने आगस्टस के समय रोम ने भौतिक, नैतिक एवं सांस्कृतिक सभी बौद्धिक एवं कलात्मक वैभव के लिए जाना जाता है तो आगस्टस युग अपनी भौतिक समृद्धि के लिए।
भारतीय इतिहास के परिप्रेक्ष्य में हम देखें तो गुप्तकाल में ज्ञान-विज्ञान, कला-स्थापत्य एवं साहित्य आदि सभी क्षेत्रों में अत्यधिक उन्नति हुई। राजनीतिक दृष्टि से समुद्रगुप्त (350-375 ई.) ने समस्त भारतवर्ष को जीत लिया। समुद्रगुप्त को स्वयं कला एवं साहित्य में रुचि थी। चन्द्रगुप्त द्वितीय विक्रमादित्य (375-412 ई.) भी कई विद्वानों का आश्रयदाता था। उसके दरबारी विद्वानों में कालिदास, वराहमिहिर, बररुचि, शंकु वेताल भट्ट, घटकर्पर, धन्वन्तरि, क्षपणक एवं अमर सिंह को उसके दरबार के नवरत्न कहा जाता था। एक केन्द्रीयकृत प्रशासनिक व्यवस्था अस्तित्व में थी। जिसमें राजा शक्तिशाली था। उसकी तुलना भगवान विष्णु से की जाती थी। आर्थिक दृष्टि से भी यह एक समृद्धि का युग था। इसलिये हम गुप्तकाल को भारत का स्वर्ण युग कहते हैं। डॉ. एल. डी. बारनैट के अनुसार गुप्तकाल का भारत के इतिहास में वही स्थान था जो यूनान के इतिहास में पेरेक्लीज युग का था।
भगवतशरण उपाध्याय ने भी गुप्त युग को स्वर्ण युग मानते हुए उसकी तुलना यूनान के पेरेक्लीज युग, रोम के आगस्टस युग, इटली के पुनर्जागरण काल एवं इंग्लैण्ड के एलिजाबेथ काल से की है। वी. ए. स्मिथ, आर. सी. मजूमदार, ए. के. मजूमदार, एम. महेण्डेल, आर. एन. दण्डेकर एवं के. एम. मुंशी आदि कई विद्वानों ने गुप्तकाल को भारत का स्वर्ण युग माना है। इन्होंने अपने मत के समर्थन में तर्क भी दिये हैं।
कालिदास, भवभूति, भारवि और माघ गुप्तकाल के प्रमुख कवि व नाटककार थे। कालिदास ने अभिज्ञान शाकुन्तलम, रघुवंश, मालविकाग्निमित्रम्, मेघदूत, कुमारसम्भव, ऋतुसंहार विक्रमोर्वशीयम् जैसे श्रेष्ठतम साहित्य का सृजन किया। इस प्रकार इंग्लैण्ड के शेक्सपीयर को यूरोप का कालिदास माना जा सकता है। आर्यभट्ट, वराहमिहिर एवं ब्रह्मगुप्त जैसे नक्षत्र वैज्ञानिक गुप्त युग की ही देन है। गुप्तकाल में ही असंग, बसुबन्धु एवं संघरक्षित जैसे बौद्ध दार्शनिक हुए। गुप्त प्रशासक यद्यपि हिन्दू धर्म को मानते थे फिर भी अन्य धर्मों के प्रति उनका सौहार्द्र था। चन्द्रगुप्त द्वितीय का सेनापति आग्नकार्दव बौद्ध था। बसुबन्धु समुद्रगुप्त का मित्र था। चीनी यात्री फाह्यान बताता है कि गुप्त सम्राटों ने बौद्ध धर्म को संरक्षण दिया। दिल्ली का लौह स्तम्भएवं अजन्ता की गुफाओं की उत्कृष्ट चित्रकारी गुप्तकाल के चरमोत्कर्ष का प्रतीक है। इस प्रकार सकारात्मक दृष्टि से देखा ताए तो गुप्तकाल भारत का स्वर्ण युग था।
रोमिला थापर ने स्वर्ण युग अथवा क्लासिकल युग को परिभाषित करते हुए लिखा है कि ‘क्लासिकल युग वह युग है
जिसमें साहित्य, वास्तुकला तथा ललित कलाएँ उत्कर्ष के ऐसे सकें।’ यह परिभाषा गुप्तकाल के सन्दर्भ में हमें उसे स्वर्णयुग स्तर पर पहुँच जाएँ कि आने वाले समय के लिए वे आदर्श बन का दर्जा देने को बाध्य करती है। आर. सी. मजूमदार ने लिखा है कि गुप्त सम्राटों ने भारतीय इतिहास पर अपनी छाप छोड़ी और उन्होंने ऐसा आदर्श पेश किया जो कि भविष्य में अनुकरणीय था। उस काल में लोगों ने सभी क्षेत्रों में ऐसी उन्नति की जिसकी आज भी सराहना होती है।
डी. एन. झा एवं कृष्ण मोहन श्रीमाली आदि विद्वानों
ने गुप्तकाल को स्वर्ण युग नहीं माना। अपने मत को सिद्ध करने हेतु उन्होंने गुप्तकाल की बुराइयों को खोजने का प्रयास किया है। सभी जानते हैं कि चाँद खूबसूरत है, मगर लोग उसमें भी दाग को देख लेते हैं। बुराई किसमें नहीं है, हमें अपना ध्यान इस पर केन्द्रित करना है कि सबसे कम खराब कौन है? इस सकारात्मक सोच के साथ देखने पर गुप्त काल हर हालत में स्वर्ण युग था। इससे हमें गर्वानुभूति भी होती है और अपने युग को श्रेष्ठ बनाने की प्रेरणा भी मिलती है।
कृषि का बदलता स्वरूप
(Changing Nature of Agriculture)
लोहे के फाल वाले हल के प्रयोग ने कृषि की पैदावार को बढ़ाने में महत्वपूर्ण योगदान दिया। पहले धान के बीज अंकुरित कर पौधे पानी से भरे खेत में रोप दिये जाते थे। बाद में धान की रोपाई उन क्षेत्रों में की जाने लगी जहाँ पानी अत्यधिक मात्रा में उपलब्ध था। गंगा की घाटी में धान की रोपाई करने से उपज में अत्यधिक वृद्धि हुई।
सिंचाई के लिये कुंआ, तालाब एवं नहरों का उपयोग किया जाता था। मौर्यकाल से लेकर गुप्तकाल तक सुदर्शन झील पर शासकों ने पर्याप्त ध्यान दिया। रुद्रदामन एवं स्कन्दगुप्त के जूनागढ़ अभिलेख इसका प्रमाण हैं। चन्द्रगुप्त मौर्य, अशोक, रुद्रदामन एवं स्कन्दगुप्त ने सिंचाई व्यवस्था एवं जनकल्याण का पर्याप्त ध्यान रखा। इनके प्रान्तीय राज्यपाल पुष्यगुप्त, तुसास्प, सुविशाख एवं चक्रपालित भी सुदर्शन बाँध एवं नहरों का पर्याप्त ध्यान रखते थे।
बुद्धकाल (छठी शदी ई. पू.) से मौर्यकाल एवं गुप्तकाल तक आते-आते कृषि भारतीय अर्थव्यवस्था का प्रमुख आधार बन गई। गुप्तकाल में राजा समस्त भूमि की माप करवाता था एवं उसे टुकड़ों में विभाजित करवाता था। भूमि की सीमा निर्धारित की जाती थी। धान एवं गन्ना की खेती प्रमुख रूप से होती थी। इनके साथ-साथ गेहूँ, जूट, तिलहन, कपास, ज्वार, बाजरा, मसाले, धूप एवं नील आदि की भी पैदावार होती थी।
राजा कृषि सम्बन्धी कार्य के लिये विभिन्न पदाधिकारी नियुक्त करता था। तीन वर्ष तक कर न देने वालों को भूमि से
मौर्यकाल से गुप्तकाल तक का राजनीतिक एवं आर्थिक इतिहास
वंचित कर दिया जाता था। विक्रय की जाने वाली भूमि के निम्न नियम होते थे-
होता था। (1) अदायिक मृत व्यक्ति की भूमि का मालिक राजा
(2) गुप्त निधि-भूमि के नीचे गढ़ी गुप्त निधि राजकीय सम्पत्ति होती थी।
(3) अग्रहार मन्दिरों एवं ब्राह्मणों को दी जाने वाली भूमि अग्रहार कहलाती थी। यह भूमि कर मुक्त होती थी एवं इसका विक्रय नहीं किया जा सकता था। इसे भूमिच्छिद्र न्याय भी कहा जाता था। अतः दान पाने वाले आगे चलकर भू-स्वामी भी हो गये।
गुप्तकाल में भूमिदान के अभिलेखीय प्रमाण (Inscriptions of Land Grant in Gupta
Period)
भूमिदान का सर्वप्राचीन पुरालेखीय प्रमाण ई. पू. प्रथम शताब्दी के सातवाहन अभिलेख में मिलता है। इसमें अश्वमेघ यज्ञ में एक गाँव दान में देने की चर्चा है।
गौतमी पुत्र शातकर्णी के नासिक गुहालेख की द्वितीय पंक्ति में गोवर्धन ग्राम की भूमि के दान का उल्लेख मिलता है। यह दान बौद्ध भिक्षुओं को दिया गया था। इस दान की गई भूमि में राज्य की सेना का प्रवेश वर्जित था। राज्य का कोई भी अधिकारी यहाँ के जीवन-क्रम में कोई भी बाधा नहीं डाल सकता था।
पाँचवीं शताब्दी में ऐसे भूमि अनुदानों की प्रवृत्ति बढ़ी। इन भूमि अनुदानों द्वारा-
1. भूमि की आन्तरिक सुरक्षा एवं प्रशासन का दायित्व दान पाने वाले का होता था।
2. राजस्व के समस्त साधन भी दान पाने वाले के नाम हस्तान्तरित हो जाते थे।
डॉ. रामशरण शर्मा बताते हैं कि ‘गुप्त काल में मध्य भारत के बड़े-बड़े सामंत राजाओं द्वारा ब्राह्मणों को दानस्वरूप बसे-बसाये गाँव देने के लगभग आधा दर्जन उदाहरण मिलते हैं। इन अनुदानों में सामंत राजाओं ने सम्बन्धित गाँवों के निवासियों को जिनमें किसान और कारीगर दोनों शामिल थे, निर्देश दिया है कि वे ग्रहीताओं को कर भी दें और उनके आदेशों का पालन भी करें।’ अधिकांश भूमिदान आदिवासी, वन्य, लालमिट्टी व बंजर इलाकों में दी जाती थी जहाँ से लगान के रूप में कुछ भी प्राप्त नहीं होता था।
प्रभावती गुप्त का पूना ताम्रपत्र अभिलेख भी भूमि अनुदान का एक प्रमुख उदाहरण प्रस्तुत करता है। प्रभावती गुप्त सम्राट चन्द्रगुप्त द्वितीय (375-414 ई.) की पुत्री थी। इसका विवाह दक्कन पठार के वाकाटक राजा रुद्रसेन द्वितीय से किया गया था। रुद्रसेन को मृत्युपरान्त प्रभावती गुप्त ने अपने नाबालिग पुत्र दिवाकर सेन को संरक्षिका के रूप में शासन किया था। प्रभावती गुप्त का यह भूमि अनुदान अभिलेख 5वीं शदी ई. का है। इसमें लिखा हुआ है
युवराज दिवाकर सेन की माता श्री प्रभावती गुप्त दङ्गुण ग्राम के कुटुबिनों, ब्राह्मणों एवं अन्य वासियों को आदेश देती है कि….. आपको ज्ञात हो कि यह ग्राम अपने पुण्य की प्राप्ति के लिये कार्तिक शुल्क द्वादशी को भगवत पादुकाओं पर निवेदन करके भगवत भक्त आचार्य चनालस्वामी को जल अर्पण के साथ दान दिया गया। आपको इनके सभी आदेशों का पालन करना चाहिये।
इस गाँव में सैनिक प्रवेश नहीं करेंगे। दौरे पर आने वाले शासकीय अधिकारियों को घोड़ों के लिये घास, आसन के लिये जानवर की खाल, भोजन पकाने के लिये कोयला आदि देने के उत्तरदायित्व से यह गाँव मुक्त रहेगा। इस गाँव को खनिज देने, फूल और दूध देने से छूट रहेगी। इस गाँव का दान इसके भीतर की सम्पत्ति और छोटे-बड़े सभी करों सहित किया गया है। जो इस आदेश के पालन करने में बाधा उत्पन्न करेगा या करायेगा उसे ब्राह्मण ग्रन्थों के विधानानुसार दण्डित किया जायेगा।
यह आदेश 13वें शासन वर्ष में चक्रदास द्वारा खोदा गया।
भूमिदान आखिर क्यों दिया जाता था. इस प्रश्न को लेकर इतिहासकारों में मतभेद हैं। कुछ इतिहासकारों का मानना है कि कृषि के विस्तार एवं नये क्षेत्र को प्रोत्साहित करने के उद्देश्य से भूमि दान दिये जाते थे। कुछ इतिहासकारों का मानना है कि राजा चूँकि दुर्बल होते जा रहे रहे थे, अतः भूमिदान के माध्यम से वे अपने लिये समर्थक जुटाने का प्रयास कर रहे थे। कुछ का यह मानना है कि राजा भूमिदान द्वारा अपनी शक्ति एवं श्रेष्ठता साबित करने का प्रयास कर रहे थे।
त्रस्तुतः कारण जो भी हो हमें इन भूमिदान अभिलेखों से तत्युगीन कृषि व्यवस्था, भूमि व्यवस्था, समाज एवं संस्कृति की जानकारी मिलती है जो कि महत्वपूर्ण है।
गुप्तोत्तर काल में कला एवं स्थापत्य
(Art and Architecture During The Post Gupta Period)
गुप्तोत्तर काल (600-1200 ई.)
कला एवं स्थापत्य की दृष्टि से गुप्तोत्तर काल (600-1200 ई.) भी अद्वितीय था। गुप्तोत्तरकालीन कला एवं, स्थापत्य को दो भागों में बाँटा जा सकता है-
मामल्लपुर के रथ मन्दिर और मूर्तियाँ, एलोरा के कैलाश मन्दिर (1) 600-900 ई-इसके अन्तर्गत मुख्य रूप से एवं एलिफैण्टा के मन्दिर आते हैं।
उड़ीसा, राजपूताना, चोल, पल्लव वंशों द्वारा निर्मित मन्दिर आते हैं। (2) 900-1200 ई-इसमें खजुराहो (बुन्देलखण्ड), शैली की दृष्टि से कला एवं स्थापत्य के तीन भाग थे-
बुन्देलखण्ड, राजपूताना, गुजरात के मन्दिर)। (1) नागर शैली- उत्तरी भारत की कला (बंगाल, उड़ीसा,
(2) वेसर शैली-
दक्षिणापथ की शैली।
(3) द्रविड़ शैली-
सुदूर दक्षिण की शैली।
उत्तरी भारत की शैली में मन्दिरों का गुम्बदाकार आकार, उच्च शिखर, कलश, प्रदक्षिणा मार्ग एवं सभा मण्डपों का प्रमुख
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स्थान था। दक्षिणी भारत की शैली में मन्दिरों का पिरामिड आकार, चपटे गुम्बद, अनेक स्तम्भों वाले सभागृह, सम्पूर्ण मन्दिर को अनेक मूर्तियों से अलंकृत करना और विशाल प्रवेश द्वार (गोपुरम) प्रमुख स्थान रखते थे।
इस काल में बने हुए किलों में चित्तौड़, माण्डू, ग्वालियर एवं राजप्रसादों में जयपुर, ग्वालियर के राजमहल तथा मन्दिर प्रमुख हैं।
इस काल की मूर्ति कला में देवी-देवताओं की मूर्तियाँ बनायो गयीं। मूर्तियों में तान्त्रिक विचारधारा का प्रभाव देखा जा सकता है। इसी कारण स्त्री-पुरुषों की नग्न और कामचेष्टा में लिप्त मूर्तियों का निर्माण हुआ। खजुराहो को मूर्तियाँ ऐसी ही मूर्तियाँ हैं।
चित्रकला में अजन्ता, बाप एवं सित्तनवासल आदि गुफाओं के कुछ चित्र गुप्तोत्तरकालीन माने जाते हैं। इस काल में राजस्थानी, कश्मीरी एवं कांगड़ा चित्र शैलियों का आविर्भाव हुआ।
इस प्रकार हम देखते हैं कि गुप्त काल एवं गुप्तोत्तर काल दोनों में ही कला एवं स्थापत्य का अत्यधिक विकास हुआ।
दक्षिण भारत में गुप्त एवं उत्तर-गुप्तकालीन विकास (1200 ई. तक)
[Development of Gupta and Post-Gupta Times in South India
n (Upto 1200 A.D.)]
मन्दिर : कला एवं स्थापत्य (Temples: Art and
Architecture)
मौर्यकाल से गुप्तकाल तक का राजनीतिक एवं आर्थिक इतिहास
छठी से बारहवीं शताब्दी के बीच दक्षिण भारत में जो मन्दिर बने, वे द्रविण शैली का प्रतिनिधित्व करते थे तथा कला एवं स्थापत्य की दृष्टि से बेजोड़ थे। राष्ट्रकूट, पल्लव, चालुक्य एवं चोल राजवंशों द्वारा दक्षिण भारत में अनेकानेक मन्दिरों का निर्माण कराया जो कि उत्कृष्ट कला एवं स्थापत्य का प्रतिनिधित्व करते थे।
गुप्तोत्तर काल में कला की मुख्यतः तीन शैलियाँ विकसित हुई-
(1) नागर शैली-यह उत्तरी भारत की शैली थी। इसे हिमालय से लेकर विन्ध्याचल के बीच की शैली माना गया है। इस शैली के प्रमुख मन्दिर-लिंगराज एवं पुरी का जगन्नाथ मन्दिर, कोणार्क का सूर्य मन्दिर, खजुराहो के मन्दिर, दिलवाड़ा का मन्दिर आदि हैं।
(2) बेसर शैली यह उत्तर भारत की नागर शैली एवं दक्षिण भारत की द्रविण शैली का मिश्रित रूप है। चालुक्य मन्दिरों में उत्तर एवं दक्षिण की शैलियों का मिश्रण है, अतः चालुक्य शैली वेसर शैली का प्रतिनिधित्व करती है। इसे कृष्णा और कन्याकुमारी के बीच की शैली कहा गया है। चालुक्यकालीन मन्दिर एलोरा का कैलाश मन्दिर, एलीफैण्टा के गुहा मन्दिर इसी शैली के हैं।
(3) द्रविड़ शैली- सुदूर दक्षिण भारत की कला शैली द्रविड़ कही जाती है। पल्लवकालीन मन्दिर जहाँ इसकी प्रारम्भिक अवस्था की दशति हैं, वहीं चोलकालीन मन्दिर इसकी विकसित अवस्था के प्रतीक हैं। मामल्लपुर के रथ मन्दिर, काँची का कैलाशनाथ मन्दिर, तन्जौर का राजराजेश्वर मन्दिर, गंगैकोण्ड चोलपुरम के मन्दिर इसी शैली के हैं।
राष्ट्रकूटकालीन मन्दिर: कला एवं स्थापत्य (Temples of Rastrakoot Age: Art and
Architecture)
एलौरा का कैलाश मन्दिर एवं एलीफैण्टा की त्रिमूर्ति राष्ट्रकूट-कालीन कला एवं स्थापत्य की प्रमुख देन है। एलोरा
का कैलाश मन्दिर अपनी आश्चर्यजनक शैली के लिए विश्वविख्यात है। डॉ. वी.ए. स्मिथ ने मंदिर के बारे में लिखा है, “ठोस चट्टान से निकाली गयी इस मंदिर की संरचना निःसंदेह भारत की सबसे आश्चर्यजनक शिल्पकला की बेजोड़ मिसाल है।” यह गुहा कला का एक उदाहरण है। अभी तक नीचे से पर्वत को गहराई में खोदते हुए खोखला कर गुहाएँ बनायी जाती थीं और इन्हीं में गुहा मन्दिर बनते थे परन्तु कैलाश नाथ मन्दिर में स्थापत्य की एक अलग शैली उपयोग में लायी गयी है। इसमें कलाकारों ने पर्वत को ऊपर शीर्ष से तराशना प्रारम्भ किया है और इसी विधि से चट्टान को ऊपर से नीचे की ओर तराशते हुए ऊपर से नीचे तक मन्दिर के सभी अंग निर्मित किये गये हैं।
इस मन्दिर का निर्माण राष्ट्रकूट शासक कृष्ण प्रथम (756-773 ई.) ने अत्यधिक धन व्यय करके कराया था। यह मन्दिर एक ही चट्टान को उपरिवर्णित प्रकार से तराश कर बनाया गया है। इसका विशाल प्रांगण 275 फुट लम्बा तथा 154 फुट चौड़ा है। इसमें विशाल स्तम्भ लगे हुए हैं। छत पर मूर्तिकारी की गयी है। मन्दिर के ऊपर का विशाल शिखर 95 फुट ऊँचा है तथा वह पिरामिडाकार चारतल्ला है। मन्दिर में प्रवेश द्वार तथा मण्डप बनाये गये हैं। इसकी चौकी 25 फुट ऊँची है। चौकी के ऊपर और नीचे का भाग काफी ढला हुआ है। मन्दिर का विमान एक समानान्तर चतुर्भुज के आकार में बना है। विमान के बीच वाले भाग पर हाथी व शेरों की मूर्तियाँ उकेरी गई हैं। ये हाथी और शेर भी विमान को धारण करने का आभास देते हैं। मन्दिर को वीथियों में अनेक देवी-देवताओं की मूर्तियाँ उत्कीर्ण हैं। इनमें गोवर्धन धारण किये कृष्ण, महिषासुर का वध करती दुर्गा, कैलाश पर्वत उठाये हुए रावण, सीता हरण, जटायु से युद्ध. शिव के विभिन्न रूप आदि का कुशलतापूर्वक अंकन किया गया है। इस प्रकार एलोरा का यह मन्दिर विश्व में प्रस्तर कला की अद्वितीय कृति है।
एलोरा के अन्य मन्दिरों में रावण की खाई, रामेश्वर,
दशावतार, लम्बेश्वर, नीलकण्ठ आदि उल्लेखनीय हैं। दशावतार मन्दिर में विष्णु के दस अवतारों की कथा मूर्तियों पर वत्कीर्ण है। इसका निर्माण आठवीं सदी में दन्ति दुर्ग के काल में हुआ था। एलीफैण्टा की कुछ गुफाओं में भी सम्भवतः राष्ट्रकूटी द्वारा निर्माण कराया गया है। इनमें त्रिमूर्ति जिसमें शिव के तीन मुख दिखाये गये हैं, अधिक प्रसिद्ध हैं। राष्ट्रकूटों के समकालीनों गुर्जरों-प्रतिहारों ने विष्णु के ब्रहमांण्डीय रूप को अंकित करके संवेदनशील मूर्तियों का सूजन किया जैसे शिव और पार्वती का विवाह। इस प्रकार राष्ट्रकूटकालीन कला एवं स्थापत्य
अत्यन्त उत्कृष्ट है।